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________________ कदिभागो उवसामिज्जदि एदस्स गाहावयवस्स परूवणा १७ ४५. कुदो १ सव्वासु ट्ठिदीसु सव्वेसिं अणुभागफड्डयाणं सव्ववग्गणाणं च संभवदंसणादो । एदस्स भावत्थो - सव्वाणुभागफड्डयाणं सव्ववग्गणाणं च तत्थ एक्केक्कस्स फड्डयस्स एक्केक्किस्से वग्गणाए च जइ वि एगेगपरमाणुपदेसाणुभागसमदि तो वि सव्वाणि फड्डयाणि सव्ववग्गणाओ च उवसम्मेदि ति वच्चदे | सरिसधणियपरमाणूण पुणो वि अत्थि चैव कारणं, पढमसमयम्मि सरिसधणियवग्गणाणं असंखेज्जदिभागं चेव उवसामेदिति । तदो सव्वाणि फड्डयाणि सव्ववग्गणाओ च पडिसमयमुवसामिज्जति त्ति भणिदं । एत्थ बंधावलियमुदयावलियं च मोत्तूणेति ण वत्तव्वं, सव्वेसि द्विदिविसेसेसु सब्वासि फडयवग्गणाणं संभवे तहाविहवयणविसेसस्स फलविसेसाणुवलंभादो । एवं ताव 'कदिभागमुवसामिज्जदि' त्ति एदस्स पदस्स 'डिदिअणुभागे पदेसग्गे' इच्चेदेण चरिमावयवेण कयाहिसंबंधस्स अत्थपरूवणा कया । भाग-14 $ ४६. संपहि 'संकमणमुदीरणा च कदिभागो' त्ति एदस्स सुत्तावयवस्स सुत्तसूचिदमत्थविवरणं कस्मामो । तं जहा - पदेससंकमो ताव अबज्झमाणपयडीणं समयं पडि असंखेज्जगुणो च सेढीए दट्ठव्वो । कारणं, सेटिं मोत्तूण हेट्ठा सव्वत्थ अबज्झमाणामप्पसत्थपडीणं विज्झादसंकमो होदि । सेढीए पुण गुणसंकमो होदिति । ४५. क्योंकि सब स्थितियोंमें सब अनुभागसम्बन्धी स्पर्धकों और सब वर्गणाओंकी उपशमनक्रिया सम्भव प्रतीत होती है । इसका भावार्थ - सब अनुभागस्पर्धक और सब वर्गणाओंके मध्य वहाँ एक-एक स्पर्धक और एक-एक वर्गंणाके यद्यपि एक-एक परमाणुप्रदेशसम्बन्धी अनुभागको उपशमाता है तो भी सभी स्पर्धकों और सभी वर्गणाओंको उपशमाता है ऐसा कहा जाता है । सदृश धनवाले परमाणुओंकी अपेक्षा फिर भी कारण है कि प्रथम समय में सदृश धनवाली वर्गणाओंके असंख्यातवें भागको ही उपशमाता है, इसलिये सभी स्पर्धक और सभी वर्गणाएँ प्रत्येक समयमें उपशमाई जाती हैं यह कहा है । यहाँपर बन्धावलि और उदयावलिको छोड़कर ऐसा नहीं कहना चाहिये, क्योंकि सभी स्थितिविशेषोंमें सभी स्पर्धक और वर्गणाऐं सम्भव हैं, इसलिए उक्त प्रकारके वचनविशेषका कोई फल विशेष नहीं पाया जाता । इस प्रकार 'कदिभागमुवसामिज्जदि' इस पदका 'ठिदि - अणुभागे पदेसग्गे' इस पदके साथ सम्बन्ध करके अर्थ की प्ररूपणा की । विशेषार्थ - यहाँ प्रत्येक समयमें कितने अनुभागको उपशमाता है इसका विचार करते हुए बतलाया है कि जितने भी स्थितियोंके भेद हैं उन सबमें सदृश धनवाली वर्गणाएँ होती हैं, इसलिए यहाँ बन्धावलि और उदयावलिको छोड़कर ऐसा कहनेका प्रयोजन नहीं रहता। और ऐसी अवस्था में सदृश धनवाली वर्गणाओंके असंख्यातवें भागको उपशमाता है ऐसा होनेसे अनुभागसम्बन्धी सभी स्पर्धकों और सभी वर्गणाओंको उपशमाता है यह कथन बन जाता है । $ ४६. अब 'संकममुदीरणा च कदिभागो' गाथासूत्र के इस अवयवसम्बन्धी गाथासूत्रसे सूचित अर्थका विशेष व्याख्यान करते हैं । वह जैसे - अबध्यमान प्रकृतियों का प्रदेशसंक्रम प्रत्येक समय में श्रेणिरूप से असंख्यातगुणा जानना चाहिये, क्योंकि श्रेणिको छोड़कर नीचे सर्वत्र अबध्यमान अप्रशस्त प्रकृतियोंका विध्यातसंक्रम होता है । परन्तु श्रेणिमें गुणसंक्रम होता है । बध्यमान ३
SR No.090226
Book TitleKasaypahudam Part 14
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages442
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size40 MB
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