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________________ गाथा ११४ ] अणि किरणे कज्जविसेस परूवणा ४५ डिदिखंडयघादं कुणमाणस्स संखेज्जसहरूसमेत्तेसु ठिदिखंडएस गदेसु तदो हेट्ठा दूररमोइणस्स दूराव किट्टिसणिदं सव्वपच्छिमं पलिदोवमस्स संखेज्जभागप्रमाणं दिसंतकम्ममवसि होइ । पुणो तत्तो पहुडि सेसस्स असंखेज्जे भागे आगाएंतो ट्ठिदिखंडयघादमाढवे, तदवस्थाए जीवस्स तहा घादणसत्तीए बज्झतरंगकारणसण्णिहाणवसेण समुप्पण्णत्तादो | का दूरावकिट्टी णाम ? बुच्चदे – जत्तो ट्ठिदिसंतकम्मावसेसादो संखेज्जे भागे घेत्तण ठिदिखंडए घादिज्जमाणे घादिदसेसं णियमा पलिदो - वमस्स असंखेज्जदिभागपमाणं होण चिट्ठदि तं सव्वपच्छिमं पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागपमाणं विदिसंतकम्मं दूरावकिट्टि ति भण्णदे । किं कारणमेदस्स ट्ठिदिवि से सस्स दूरावकिट्टिसण्णा जादा त्ति चे १ पलिदोवमट्ठिदिसंतकम्मादो सुडु दूरयरमोसारिय सव्वजहण्णपलिदोवमसंखेज्जभागसरूवेणावट्ठाणादो | पन्योपमस्थितिकर्मणोऽधस्ताद्दूरतरमपकृष्टत्वादतिकृशत्वाच्च दूरापकृष्टिरेषा स्थितिरित्युक्तं भवति । अथवा दूरतरमपकृष्यतेऽस्याः स्थितिकरंडकमिति दूरापकृष्टिः । इतः प्रभृत्यसंख्येयान् भागान् गृहीत्वा स्थितिकांडकघातमाचरतीत्यतो दूरापकृष्टिरिति यावत् । किमेसा दूरावकिट्टी एगवियप्पा स्थितिसत्कर्मके संख्यात बहुभागको ग्रहण कर स्थितिकाण्डकघात करनेवाले जीवके संख्यात हजार स्थितिकाण्डकोंके जानेपर उससे नीचे बहुत दूर गये हुए जीवके दूरापकृष्टि संज्ञावाला सबसे अन्तिम पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण स्थितिसत्कर्म शेष रहता है । पुनः उससे आगे शेषके असंख्यात बहुभागको ग्रहण करता हुआ स्थितिकाण्डकघात करता है, क्योंकि उस अवस्था में जीवके बाह्य और आभ्यन्तर कारणोंका सन्निधान होनेसे उस प्रकारके घात करनेकी शक्ति पाई जाती है । शंका- दूरापकृष्टि किसे कहते हैं ? समाधान – कहते हैं - जिस अवशिष्ट सत्कर्ममेंसे संख्यात बहुभागको ग्रहण कर स्थितिकाण्डका घात करने पर घात करनेसे शेष बचा स्थितिसत्कर्म नियमसे पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण होकर अवशिष्ट रहता है उस सबसे अन्तिम पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण स्थितिसत्कर्मको दूरापकृष्टि कहते हैं । शंका – इस स्थितिविशेषको दूरापकृष्टि संज्ञा किस कारण से है ? - समाधान —क्योंकि पल्योपमप्रमाण स्थितिसत्कर्मसे अत्यन्त दूर उतर कर सबसे जघन्य पल्योपमके संख्यातवें भागरूपसे इसका अवस्थान है । पल्योपमप्रमाण स्थितिसत्कर्मसे नीचे अत्यन्त दूर तक अपकर्षित की गई होनेसे और अत्यन्त कृश - अल्प होनेसे यह स्थिति दूरापकृष्टि है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अथवा इसका स्थितिकाण्डक अत्यन्त दूर अपकर्षित किया जाता है, इसलिये इसका नाम दूरापकृष्टि है । यहाँसे लेकर असंख्यात बहुभागोंको प्रहण कर स्थितिकाण्डकघात किया जाता है, अतः यह दूरापकृष्टि कहलाती है यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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