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________________ गाथा ११४ ] अपुव्वकरणे कज्जविसेस परूवणा २३ पंचकम्माणं पंचणाणावरणादीणमणंतगुणहाणीए अणुभागषंधमोवट्टदि । अण्णं च ट्ठिदिबंधे अंतोमुहुत्तकालपडिबद्धे पुण्णे अण्णं ट्ठिदिबंधमाढवेमाणो पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागेण हाइदूण बंधइ, विसोहिपरिणामस्स ठिदि - बंधवुड्डिविरुद्धसहावत्तादोति । $ २९ एवमेत्तिएण पबंधेण अधापवत्तकरणविसयं फलविसेसमुवसंदरिसिय संपहि तव्विसयपरूवणमुवसंहारेमाणो इदमाह - * एसा अधापवत्तकरणे परूवणा । ३०. एसा अणंतरणिद्दिट्ठा परूवणा अधापवत्तकरणविसये परूविदा त्ति भणिदं होइ । एवमेदमुवसंहरिय संपहि अपुव्वकरणविसायं परूवणापबंधमाढवेमाणो इदमाह * अपुव्वकरणस्स पढमसमए दोयहं जीवाणं ठिदिसंतकम्मादो ठिदिसंतकम्मं तुल्लं वा विसेसाहियं वा संखेज्जगुणं वा । ट्ठिदिखंडयादो वि हिदिखंडयं दोहं जीवाणं तुल्लं वा विसेसाहियं वा संखेज्जगुणं वा । को लिये हुए अनुभागबन्ध करता है । पाँच ज्ञानावरणादि अशुभ कर्मोंका अनन्तगुणी हानिरूपसे अनुभागबन्धका अपवर्तन करता है । तथा अन्य अन्तर्मुहूर्त कालसम्बन्धी स्थितिबन्ध पूर्ण होनेपर अन्य स्थितिबन्धका आरम्भ करता हुआ पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण स्थितिको घटाकर बाँधता है, क्योंकि विशुद्धिरूप परिणाम स्थितिबन्धकी वृद्धिके विरुद्ध स्वभाववाला होता है । विशेषार्थ — अधःप्रवृत्तकरण में यद्यपि स्थितिकाण्डकघात, अनुभागकाण्डकघात, गुणश्रेणिरचना और गुणसंक्रमस्वरूप कार्य विशेष नहीं होते तथापि वहाँ परिणामोंमें प्रत्येक समय अनन्तगुणी विशुद्धि होनेसे सातादि शुभ कर्मोंका प्रति समय अनन्तगुणी वृद्धिस्वरूप और ज्ञानावरणादि अशुभ कर्मोंका प्रति समय अनन्तगुणी हानिस्वरूप अनुभागबन्ध करता है। तथा अधःप्रवृत्तकरणके कालके संख्यातवें भागप्रमाण प्रथम अन्तर्मुहूर्त में प्रति समय जितना स्थितिबन्ध करता है, दूसरे अन्तर्मुहूर्त में उसकी अपेक्षा पल्योपमका संख्यातवाँ भागकम स्थितिबन्ध करता है । इस प्रकार यह क्रिया अधःप्रवृत्तकरण में बराबर चालू रहती है । $ २९. इस प्रकार इतने प्रबन्ध द्वारा अधःप्रवृत्तकरणविषयक फलविशेषको दिखलाकर अब तद्विषयक प्ररूपणाका उपसंहार करते हुए इस सूत्र को कहते हैं * यह अधःप्रवृत्तकरण विषयक प्ररूपणा है । $ ३०. यह अनन्तर कही गई प्ररूपणा अधःप्रवृत्तकरणविषयक कही गई है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इस प्रकार इसका उपसंहार कर अब अपूर्वकरणविषयक प्ररूपणाप्रबन्धका आरम्भ करते हुए यह सूत्र कहते हैं * अपूर्वकरणके प्रथम समय में दो जीवोंमें से किसी एकके स्थितिसत्कर्मसे दूसरे जीवका स्थितिसत्कर्म तुल्य भी होता है, विशेष अधिक भी होता है और संख्यातगुणा भी होता है । इसी प्रकार दो जीवोंमेंसे किसी एकके स्थितिकाण्डकसे दूसरे जीवका
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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