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________________ गाथा ११४ ] अधापवत्तकरणे कज्जविसेसपरूवणा २१ उद्दिट्ठाओ तत्तो अण्णासिं पयडीणं बंधो पुव्वमेव वोच्छिण्णो त्ति वत्तव्वं । तहा जासिं पयडीणं पवेसगो ताओ मोत्तण सेसाणं पयडीणमुदयो वोच्छिण्णो त्ति वत्तव्वं हिदि-अणुभागपदेसाणं पि बंधोदयवोच्छेदविचारों एदेणेव गयत्थो त्ति ण पुणो परूविज्जदे । 'अंतरं वा कहिं किच्चा के के खवगो कहि' ति विहासा । एत्थ अंतरकरणं णत्थि । खवगो च मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्त-सम्मत्ताणं पुरदो होहिदि । २६. 'किं ठिदियाणि. कम्माणि अणुभागेसु केसु वा' एदिस्से चउत्थीए गाहाए अत्थविहासा उवसामगभंगेण कायव्वा । एवमेदासिं चउण्हं गाहाणमधापवत्तचरिमसमए विहासं कादण तदो पयदपरूबणा अपुवकरणपढमसमयप्पहुडि आढवेयव्वा त्ति पदुप्पायणट्ठमुत्तरसुत्तावयारो___* एदाओ चत्तारि सुत्तगाहाओ विहासियूण अपुव्वकरणपढमसमए आढवेयव्वो। और उदयकी अपेक्षा कौन-कौन कांश क्षीण होते हैं। इसकी विभाषा। वहाँ प्रकृतिबन्धमें जिन प्रकृतियोंका निर्देश किया है उनके सिवाय अन्य प्रकृतियोंका बन्ध पहले ही व्युच्छिन्न हो जाता है ऐसा कहना चाहिए। तथा जिन प्रकृतियोंका प्रवेशक है उनके सिवाय शेष प्रकृतियोंकी उदयव्युच्छित्ति हो जाती है ऐसा कहना चाहिए। स्थिति, अनुभाग और प्रदेश विषयक भी बन्ध और उदयव्युच्छित्तिका विचार उक्त कथनसे ही गतार्थ है, इसलिए इनका पुनः कथन नहीं करते हैं। उक्त जीव 'अन्तर कहाँपर करता है और कहाँ किन-किन कर्मोंका झपक होता है' इसकी विभाषा। यहाँ दर्शनमोहकी क्षपणामें अन्तरकरण नहीं होता तथा मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वका आगे झपक होगा। विशेषार्थ-दर्शनमोहकी 'क्षपणा करनेवाला जीव वेदकसम्यग्दृष्टि होता है। इसके क्षायिक सम्यक्त्वके उत्पन्न होनेके प्रथम समयके पूर्व तक वेदकसम्यक्त्व बना रहता है और क्षायिक सम्यक्त्वकी प्राप्ति दर्शनमोहनीयकी तीनों प्रकृतियोंका क्षय होनेपर होती है, इसलिए दर्शनमोहकी क्षपणामें अन्तरकरणका निषेध किया है । शेष कथन सुगम है । $ २६. उक्त जीव 'किस स्थितिवाले कर्मोंका और किन अनुभागोंमें स्थित कर्मोंका अपवर्तन करके किस स्थानको प्राप्त करता है।' इस चौथी गाथाकी अर्थविभाषा उपशामकके समान करनी चाहिए। इस प्रकार इन चार गाथाओंकी अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें विभाषा अर्थात् विशेष व्याख्यान करके तदनन्तर प्रकृत प्ररूपणाको अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर आरम्भ करनी चाहिए इस बातका कथन करनेके लिये उत्तर सूत्रका अवतार करते हैं * इन चार सूत्रगाथाओंका विशेष व्याख्यान करके अपूर्वकरणके प्रथम समयमें प्रकृत प्ररूपणाका आरम्भ करना चाहिए । १. ता०प्रती बंधोदयविचारो इति पाठः । २. ता०प्रती एवमेदेसि इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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