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________________ १० जयधवलास हिदे कसायपाहुडे [ दंसणमोहक्खवणा तत्थ जो देव-रएसु आउअबंधवसेणुप्पज्जदि खीणदंसणमोहणीओ जीवो सो देवहिंतो आगंतूणानंतरभवे चेव चरिमदेहसंबंधमणुभूय सिज्झदि ति तस्स दंसणमोहक्खवणाभवेण सह तिष्णि चैव भवग्गहणाणि होंति । जो उण पुव्वाउअबंधवसेण भोगभूमिजतिरिक्ख-मणुस्सेसुप्पज्जइ तस्स खवणापट्टणभवं मोत्तूण अण्णे तिण्णि भवा होंति । तत्तो गंत्तूण देवेसुप्पज्जिय तदो चविय मणुस्से सुप्पण्णस्स णिव्वाणमणिमदंसणादो | (६१) संखेज्जा च मणुस्सेसु खीणमोहा सहस्ससो णियमा । सेसासु खीणमोहा गदीसु णियमा असंखेज्जा ॥११४॥ ६८. एसा पंचमी मूलगाहा । एदीए खीणदंसणमोहाणं जीवाणं पमाणपदुपायणदुवारेण संतादिअट्ठाणियोगद्दारेहिं परूवणा सूचिदा, देसामासयभावेणे दिस्से पत्तदो । तं जहा – मणुसगदीए मणुसा खीणदंसणमोहा केत्तिया होंति त्ति पुच्छिदे द्वारा क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव नियमसे सर्व कर्मकलंकसे मुक्त होकर निर्वाणको प्राप्त होता है। यह इस सूत्रका समुच्चयार्थ है । वहाँ क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव आयुबन्धके वशसे देव और नारकियोंमें उत्पन्न होता है । वह देव और नारक भवसे आकर अनन्तर भवमें ही चरम देहके सम्बन्धका अनुभव कर मुक्त होता है । इस प्रकार उसके दर्शनमोहनीयकी क्षपणासम्बन्धी भव के साथ तीन ही भवोंका ग्रहण होता है । परन्तु जो पूर्व में बन्धको प्राप्त हुई आयुके सम्बन्धवश भोगभूमिज तिर्यञ्चों और मनुष्यों में उत्पन्न होता है उसके क्षपणाके प्रस्थापनके भवको छोड़कर अन्य तीन भव होते हैं, क्योंकि वहाँसे ( भोगभूमिसे ) देवों में उत्पन्न होकर और वहाँसे च्युत होकर मनुष्यों में उत्पन्न हुए उसके निर्वाण प्राप्त करनेका नियम देखा जाता है । विशेषार्थ – जो दर्शनमोहकी क्षपणा करनेवाला जीव तद्भव मोक्षगामी नहीं होता वह उस भवके अतिरिक्त अधिकसे अधिक अन्य तीन भव तक संसार में रहता है यह नियम इस गाथा द्वारा किया गया है। यदि नरकायुका बन्ध करनेके बाद क्षायिक सम्यग्दृष्टि हुआ है या उस भव में देवायुका बन्ध किया है तो वह उस भवसे तीसरे भवमें मोक्षका पात्र होता है और यदि तिर्यवायु और मनुष्यायुका बंध करनेके बाद क्षायिक सम्यग्दृष्टि हुआ है तो वह उस भवसे चौथे भवमें मोक्षका पात्र होता है यह उक्त गाथासूत्रका तात्पर्य है । विशेष खुलाशा मूलमें किया ही है । मनुष्यों में क्षीणमोही अर्थात् क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव नियमसे संख्यात हजार होते हैं तथा शेष गतियोंमें नियमसे असंख्यात होते हैं ।। ११४ ॥ $ ८. यह पाँचवीं मूलगाथा है । इस द्वारा क्षीणदर्शनमोही जीवोंके प्रमाणके कथन द्वारा सत् आदि अनुयोगद्वारोंके आश्रयसे प्ररूपणा सूचित की गई है, क्योंकि देशाम भाव यह सूत्र प्रवृत्त हुआ है । यथा - मनुष्यगतिमें जिन्होंने दर्शनमोहका क्षय कर दिया है ऐसे मनुष्य कितने हैं ऐसी पृच्छा करनेपर नियमसे संख्यात ही हैं यह कहा है और वे गणनाको
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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