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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुरे [दसणमोहक्खवणा (५८) मिच्छत्तवेदणीए कम्मे ओवहिदम्मि सम्मत्ते। खवणाए पट्रवगो जहण्णगो तेउलेस्साए ॥१११॥ $ ४. एसा गाहा दंसणमोहक्खवणापट्ठवगो कम्हि उद्देसे होइ त्ति पुच्छिदे उत्पन्न होकर मोक्ष गये और उन्हींके विहार कालके समय एकेन्द्रिय पर्यायसे आकर उत्पन्न हुए वर्द्धनकुमार आदिने दर्शनमोहनीयकी क्षपणा की। इससे स्पष्ट है कि दुषमसुषमा कालमें कर्मभूमिमें उत्पन्न हुए मनुष्य जिन, केवली और तीर्थंकरके सद्भावमें तो दर्शनमोहनीयकी क्षपणाका प्रारम्भ करते ही हैं पर कदाचित् जब सुषमादुषम कालके अन्तिम भागमें तीर्थंकर जन्म लेकर केवली होते हैं तब उस कालमें उत्पन्न हुए मनुष्य भी दर्शनमोहनीयकी क्षपणाका प्रारम्भ करते हैं । अब यहाँ पर यह विचार करना है कि जो जीव दूसरे और तीसरे नरकोंसे आकर तीर्थकर होते हैं वे क्षायिक सम्यग्दृष्टि तो होते नहीं, फिर उन्हें इसकी प्राप्ति कैसे होती है ? इसका समाधान करते हुए वहाँ वीरसेन स्वामीने जो बतलाया है उसका आशय यह है कि मुनिपद अंगीकार करनेके बाद वे स्वयं श्रुतकेवली जिन हो जाते हैं, इसलिए उनके दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करने में कोई बाधा नहीं आती। वहाँ 'दसणमोहणीयं कम्म खवेदु-' इत्यादि सूत्र में 'जिणा केवली तित्थयरा' ये तीन पद आये हैं सो सर्वप्रथम तो वीरसेन स्वामीने 'जिणा' और 'केवली' इन दोनों पदोंको 'तित्थयरा' पदका विशेषण स्वीकार कर यह अर्थ फलित किया है कि तीर्थंकर केवली जिनके पादमूलमें ही वहाँ ( कर्मभूमिमें ) उत्पन्न हुए मनुष्य ही दर्शनमोहनीयकी क्षपणाका प्रारम्भ करते हैं। किन्तु इस अर्थके स्वीकार करने पर सामान्य केवलियों और श्रुतकेवलियोंका ग्रहण नहीं होता, इसलिए उन्होंने उक्त तीनों पदोंको स्वतन्त्र रखकर 'जिन' पद द्वारा श्रुतकेवलियों और 'केवली' पद द्वारा सामान्य केवलियोंका भी ग्रहण कर यह बतलाया है कि इन तीनोंके पादमूलमें कर्मभूमिज मनुष्य दर्शनमोहनीयकी क्षपणाका प्रारम्भ करते हैं। यह तो हुआ इस बातका विचार कि दर्शनमोहनीयकी क्षपणाका प्रारम्भ कौन जीव किस कालमें किसको निमित्त कर करता है। अब प्रश्न यह है कि दर्शनमोहनीयकी क्षपणाका निष्ठापन केवल कर्मभूमिज मनुष्य ही करता है या अन्यत्र भी निष्ठापन होता है सो इस प्रश्नका समाधान करते हुए वहाँ बतलाया है कि दर्शनमोहनीयकी क्षपणाकी समाप्ति चारों गतियोंमें हो सकती है, क्योंकि दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करनेवाला जीव यदि बद्धायुष्क हो तो कृतकृत्यवेदक सम्यक्त्वको प्राप्तकर उसके काल में भुज्यमान आयुके समाप्त होनेपर आगमके अनुसार यथा नियम मरकर चारों गतियोंमें उत्पन्न हो सकता है। इतना अवश्य है कि नरकमें यदि जन्म ले तो प्रथम नरममें ही जन्मता है, देवोंमें यदि जन्म ले तो भवनत्रिकों और देवियोंको छोड़कर वैमानिकोंमें ही जन्मता है। तथा तिर्यञ्चों और मनुष्योंमें यदि जन्म ले तो उत्तम भोगभूमिके पुरुषवेदी तिर्यञ्चों और मनुष्योंमें ही जन्मता है। मिथ्यात्ववेदनीय कर्मके सम्यक्त्वमें अपवर्तित ( संक्रमित ) कर देने पर जीव दर्शनमोहनीयकी क्षपणाकी प्रस्थापक संज्ञाको प्राप्त करता है। और ऐसा जीव अर्थात् दर्शनमोननीयकी क्षपणा करनेवाला जीव जघन्यसे अर्थात् कमसे कम तेजोलेश्यामें स्थित अवश्य होता है ॥ १११ ॥ $ ४. दर्शनमोहनीयकी क्षपणाका प्रस्थापक जीव किस स्थानके प्राप्त होनेपर होता है
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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