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________________ ३३२ * सेसाणं अवद्वाणं वा । जयधवला सहिदे कसायपाहुडे [ चरितमोहणीय-उवसामणां लद्धिकम्मंसाणमणुभागुदयो बड्डी वा हाणी वा $ ३०४. एत्थ सेसग्गहणेण पंचंतराइयाणं वुदासो कओ दट्ठव्वो । तदो ते मोत्तूण चदुणाणावरण-तिदंसणावरणाणमिह ग्गहणं कायव्वं तत्तो अण्णेसिं लद्धिकम्मंसाणमेत्थाणुवलं भादो । जेसिं खओवसमपरिणामो अत्थि ते लद्धिकम्मंसा ति भण्णंते, खओवसमलद्धी होदूण कम्मंसाणं लद्धिकम्मस्स ववएससिद्धीए विरोहाभावादो । एदेसिं च लद्धिकम्मंसाणमणुभागोदयो अवट्ठिदो चेवेति णत्थि नियमो, किंतु सिमणुभागुदयस्स वड्डी वा हाणी वा अबट्ठाणं वा होज । कुदो एवं चे ? परिणामपच्चयत्ते वि तेसि छवड्डि- हाणि अवट्ठि दपरिणामाणमेत्थ संभवोवसादो । तं जहा — ओहिणाणावरणीयस्स ताव उच्चदे । उवसंतकसायम्मि जइ ओहिणाणावरणस्स • खओवसमो णत्थि तो अवट्ठिदोदयो भवदि, तत्थाणवट्ठाणकारणाणुवलंभादो । अथ खओवसमो अत्थि तो तत्थ छवड्डि-हाणि अवट्ठिदकमेणाणुभागस्स उदयो होदि । किं कारणं ९ ओहिणाणावरणक्खओवसमस्स देस - परमोहिणाणीसु असंखेज्जलोयमेयभिण्णस्स -हाण - अडिदाणमवद्विदपरिणामाणं वज्यंत रंगकारणसव्वपेक्खाणं संभवे विरोहाभावादो । तदो सब्बुकस्सखओवसमपरिणदम्मि उक्कस्सोहिणा णिन्मि * शेष लब्धिकर्मा शोंका अनुभाग- उदय वृद्धि, हानि या अवस्थानस्वरूप होता है । $ ३०४. यहाँपर सूत्र में 'शेष' पदके ग्रहण करनेसे पाँच अन्तराय प्रकृतियोंका निराकरण किया हुआ जानना चाहिए, इसलिए उन्हें छोड़कर चार ज्ञानावरण और तीन दर्शनावरण प्रकृतियों का यहाँ पर ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि उनसे अतिरिक्त अन्य लब्धिकर्माश यहाँ उपलब्ध नहीं होते | जिनका क्षयोपशमरूप परिणाम होता है वे लब्धिकर्मांश कहे जाते हैं, क्योंकि क्षयोपशमलब्धि होकर कर्माशोंकी लब्धिकर्मांश संज्ञाकी सिद्धि होनेमें विरोधका अभाव है। इन लब्धिकर्मांशोंका अनुभागउदय अवस्थित ही होता है यह नियम नहीं है । किन्तु उनके अनुभागके उदयकी वृद्धि, हानि या अवस्थान होता है । शंका- ऐसा किस कारणसे होता है ? समाधान - क्योंकि परिणाम प्रत्यय होनेपर भी उनकी छह प्रकारकी वृद्धि, छह प्रकारकी हानि और अवस्थित परिणामका यहाँपर सम्भव होनेका उपदेश पाया जाता है । यथा— सर्वप्रथम अवधिज्ञानावरणका कहते हैं । उपशान्तकषाय में यदि अवधिज्ञानावरणका क्षयोपशम नहीं है तो अवस्थित उदय होता है, क्योंकि अनवस्थितपनेका कारण नहीं पाया जाता । यदि क्षयोपशम है तो वहाँ छह वृद्धियों, छह हानियों और अवस्थित क्रमसे अनुभाग का उदय होता है, क्योंकि देशावधि और परमावधि ज्ञानी जीवोंमें असंख्यात लोकप्रमाण भेदरूप अवधिज्ञानावरणसम्बन्धी क्षयोपशमके अवस्थित परिणाम के होनेपर भी वृद्धि, हानि और अवस्थानके बाह्य और आभ्यन्तर कारणोंकी अपेक्षासे होनेमें विरोधका अभाव है । इसलिए सबसे उत्कृष्ट क्षयोपशम से परिणत हुए उत्कृष्ट अवधिज्ञानी जीव में अवधिज्ञानावरण
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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