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________________ ३२८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणा * सव्विस्से उवसंतद्धाए गुणसेढिणिक्खेवेण वि पदेसग्गेण वि अवहिदा। 5 २९८. कुदो एवं ? अवट्ठिदपरिणामत्तादो। ण चावह्रिदपरिणामस्साणवद्विदायामेणावट्ठिदपदेसग्गोकड्डणाए च गुणसेढिविण्णाससंभवो, विप्पडिसेहत्तादो । तम्हा सव्विस्से वि उवसंतद्धाए कीरमाणगुणिसेढिणिक्खेवायामेण ओकड्डिजमाणपदेसग्गेण च अवद्विदा व होदि ति सम्ममवहारिदं । अपुव्वकरणपढमसमयप्पहुडि जाव सुहुमचरिमसमयो ति ताव. मोहणीयवजाणं कम्माणं गुणसेढिणिक्खेवो उदयावलियबाहिरे गलिदसेसो भवदि । पुणो उवसंतपढमसमयप्पहुडि जाव तस्सेव चरिमसमयो त्ति ताव गुणसेढिणिक्खेवो उदयादिअवट्टिदायामो अवढिदपदेसविण्णासो च होदि त्ति एसो एत्थ सुत्तत्थसब्भावो । * पढमे गुणसेढिसीसये उदिण्णे उक्कस्सओ पदेसुदओ। 5२९९. एत्थ पढमगुणसेढिसीसये ति मणिदे उवसंतकसाएण पढमसमए णिक्खित्तगुणसेढिणिक्खेवस्स अग्गद्विदीए गहणं कायव्वं । तम्हि उदयमागदे णाणावरणादिकम्माणमुक्कस्सओ पदेसुदयो होदि । किं कारणमिदि चे ? तत्थ शंका-यह किस प्रमाणसे जाना जाता है ? समाधान-आगे कहे जानेवाले अल्पबहुत्व सूत्रसे जाना जाता है । * सम्पूर्ण उपशान्त कालमें वह ( गुणश्रेणि ) गुणश्रेणि निक्षेपकी अपेक्षा भी और प्रदेशपुञ्जकी अपेक्षा भी अवस्थित होती है। $ २९८. शंका-ऐसा किस कारणसे है ? समाधान-अवस्थित परिणाम होनेसे । और अवस्थित परिणामवाले जीवके अनवस्थित आयामरूपसे तथा अनवस्थित प्रदेशपुञ्जके अपकर्षणरूपसे गुणश्रेणिविन्यास सम्भव नहीं है, क्योंकि इसका निषेध है। इसलिये पूरे ही उपशान्त काल के भीतर किये जानेवाले गुणश्रेणिनिक्षेपके आयामकी अपेक्षा और अपकर्षित किये जानेवाले प्रदेशपुञ्जकी अपेक्षा वह अवस्थित ही होती है यह सम्यक् प्रकारसे निश्चित हुआ । अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर सूक्ष्मसाम्परायके अन्तिम समय तक मोहनीयको छोड़कर शेष कर्मोंका गुणश्रेणिनिक्षेप उदयावलिके बाहर गलित शेष होता है। परन्तु उपशान्तकषायके प्रथम समयसे लेकर उसीके अन्तिम समय तक गुणश्रेणिनिक्षेप उदयसे लेकर अवस्थित आयामवाला और अवस्थित प्रदेशोंकी रचनाको लिये हुए होता है यह यहाँ पर सूत्रके अर्थका तात्पर्य है। * प्रथम गुणश्रेणिशीर्षके उदीर्ण होनेपर उत्कृष्ट प्रदेश-उदय होता है। $ २९९. यहाँ पर प्रथम गुणश्रेणिशीर्ष ऐसा कहने पर उपशान्तकषाय जीवके द्वारा प्रथम समयमें निक्षिप्त गुणश्रेणिनिक्षेपकी अग्र स्थितिका ग्रहण करना चाहिए। उसके उदय को प्राप्त होनेपर ज्ञानावरणादि कोंका उत्कृष्ट प्रदेश उदय होता है। शंका-इसका क्या कारण है ?
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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