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________________ ३१५ गाथा १२३ ] चरित्तमोहणीय-उवसामणाए करणकन्जणिहसो कमेण णेदव्वं जाव चरिमकिट्टि त्ति । अथवा 'जहणिया किट्टी थोवा' एवं भणिदे जहण्णकिट्टीए सरिसधणियपरमाणू अणंता अस्थि । ते सव्वे घेत्तण जहणपकिट्टी णाम उच्चदे। एसा थोवा भवदि। एवं विदियकिट्टीए वि सरिसधणियसव्वपरमाणू घेत्तणाणंतगुणत्तमवगंतव्वं । एवं जाव चरिमकिट्टि त्ति । अदो चेव एदासि किट्टिववएसोअविभागपडिच्छेदुत्तरकमवड्डीए एत्थाणुवलंभादो । पुणो चरिमकिट्टीदो उवरि जहण्णफद्दयपढमवग्गणा अणंतगुणा । एवं सव्वाओ वग्गणाओ जाणिय णेदवाओ * एसो विदियतिभागो किट्टीकरणद्धा णाम । 5 २७०. जदो एवमेत्थ फद्दयगदाणुभागमोवट्टिय किट्टीओ करेदि तदो एदस्स लोभवेदगद्धाविदियतिभागस्स किट्टीकरणद्धा त्ति सण्णा अत्थाणुगया दट्ठव्या त्ति भणिदं होदि। जहा खबगसेढीए किट्टीओ करेमाणो पुवापुव्वफद्दयाणि सव्वाणि हिरवसेसमोवट्टेयूण किट्टीओ चेव ठवेदि, ण एवमेत्थ संभवो। किंतु पुव्वफद्दएसु सव्वेसु सगसरूवमछंडिय तहावट्ठिदेसु सव्वफद्द एहितो असंखेजदिमागमेत्तदव्वमोकड्डियूण एयफद्दयवग्गणाणमणंतभागमेत्ताओ सुहुमकिट्टीओ एत्थ णिव्यत्तेदि त्ति वत्तव्वं । ___ * किट्टीकरणद्धासंखेज सु भागेसु गदेसु लोभसंजलणस्स अंतोमुहुत्तहिदिगो बंधो। ही ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार एक-एक परमाणुको ही ग्रहणकर अनन्तगुणित क्रमसे अन्तिम कृष्टिके प्राप्त होने तक ले जाना चाहिए । अथवा 'जघन्य कृष्टि स्तोक है' ऐसा कहनेपर जघन्य कृष्टिमें सदृश धनवाले परमाणु अनन्त हैं। उन सबको ग्रहण कर जघन्य कृष्टि कहते हैं । यह स्तोक है । इसीप्रकार दूसरी कृष्टिमें भी सदृश धनवाले सब परमाणुओंको ग्रहण कर अनन्तगुणा जानना चाहिए। इसी प्रकार अन्तिम कृष्टि तक जानना चाहिए । इसीलिये इनकी कृष्टि संज्ञा है, क्योंकि उत्तरोत्तर अविभाग प्रतिच्छेदोंकी क्रम वृद्धि यहाँपर नहीं पाई जाती । पुनः अन्तिम कृष्टिसे ऊपर जघन्य स्पर्धककी प्रथम वर्गणा अनन्तगुणी है। इसी प्रकार सभी वर्गणाओंको जानकर कथन करना चाहिए। * इस द्वितीय विभागका नाम कृष्टिकरणकाल है। ६२७०. यतः इस प्रकार यहाँपर स्पर्धकगत अनुभागका अपवर्तनकर कृष्टियोंको करता है, अतः इस लोभवेदककालके द्वितीय त्रिभागकी कृष्टिकरणकाल यह सार्थक संज्ञा जाननी चाहिये यह उक्त कथनका तात्पर्य है। जिस प्रकार क्षपकश्रेणिमें कृष्टियोंको करता हआ सभी पूर्व और अपूर्व स्पर्धकोंका पूरी तरहसे अपवर्तनकर-कृष्टियोंको ही स्थापित करता है, उस प्रकार यहाँपर सम्भव नहीं है, क्योंकि सभी पूर्व स्पर्धकोंके अपने-अपने स्वरूपको न छोड़कर उस प्रकार अवस्थित रहते हुए सब स्पर्धकोंमेंसे असंख्यातवें भागप्रमाण द्रव्यका अपकर्षणकर एक स्पर्धककी वर्गणाओंके अनन्तवें भागप्रमाण सूक्ष्म कृष्टियोंकी यहाँपर रचना करता है ऐसा कहना चाहिये। * कृष्टिकरणकालके संख्यात बहुभागके व्यतीत होनेपर लोभसंज्वलनका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तप्रमाण होता है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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