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________________ ३०२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ चरित्तमोहणीय-उवसामणा * जे माणसंजलणस्स दोण्हमावलियाणं दुसमयूणाणं समयपबद्धा अणुवसंता ते गुणसेढीए उवसामिन्जमाणा दोहिं आवलियाहिं दुसमयूणाहिं उवसामिजिहिति । २४३. एत्थ मायावेदगपढमसमए पुवपरूविदाणं समयणदोआवलियमेत्तवकबंधसमयपबद्धाणमादिमो समयपबद्धो णिल्लेविजदि चि तं मोत्त ण अवसेसा दुसमयणा दोआवलियमेत्ता चेव णवकबंधसमयपबद्धा सुत्तणिहिट्ठा ते च समयं पडि असंखेज्जगुणाए सेढीए उवसामिजमाणा मायवेदगकालभंतरे समयणदोआवलियमेत्तकालेण गिरवसेसमुवसामिजंति, तत्थ समए समए एक्केकस्स समयपबद्धस्स उवसामणकिरियाए परिसमत्तिदंसणादो। * जं पदेसग्गं मायाए संकमदि तं विसेसहीणाए सेढीए संकमदि । $ २४४. एदस्स सुत्तस्स अत्थो जहा पुरिससवेदण वकबंधसंकमणाए पडिबद्धसुत्तस्स वुत्तो तहा परूवेयव्यो, विसेसाभावादो। * एसा परूवणा मायाए पढमसमयउवसामगस्स । $ २४५. सुगमं । एवमेदीए परूवणाए मायासंजलणमसंखेजगुणाए सेढीए उवसामेमाणस्स बहुएसु हिदिखंडयसहस्सेसु गदेसु मायासंजलणपढमहिदीए समयूणा * मान संज्वलन के दो समय कम दो आवलिप्रमाण जो अनुपशान्त समयप्रबद्ध हैं वे गुणश्रेणिद्वारा उपशमाये जाते हुए दो समय कम दो आवलिप्रमाण काल द्वारा उपशमाये जायेंगे। $ २४३. यहाँपर मायावेदकके प्रथम समयमें पूर्व में कहे गये एक समय कम दो आवलिप्रमाण नवकबन्धके समयप्रबद्धोंका आदिका समयप्रबद्ध निर्लेप होता है, इसलिए उसे छोड़कर सूत्र में निर्दिष्ट जो दो समय कम दो आवलिप्रमाण नवकबन्ध समयप्रबद्ध हैं वे प्रत्येक समयमें असंख्यातगुणी श्रेणिरूपसे उपशमाये जाते हुए मायावेदकके कालके भीतर एक समय कम दो आवलिप्रमाण कालके द्वारा पूरी तरहसे उपशमाये जाते हैं, क्योंकि वहाँपर प्रत्येक समयमें एक-एक समयप्रबद्धके उपशामन क्रियाकी समाप्ति देखी जाती है। ___ * जो प्रदेशपुञ्ज मायासंज्वलनमें संक्रमण करता है वह विशेष हीन श्रेणिक्रमसे संक्रमण करता है। $ २४४. पुरुषवेदके नवकबन्धके संक्रमणसे सम्बन्ध रखनेवाले सूत्रका अर्थ जिस प्रकार कहा है उसी प्रकार इस सूत्रका अर्थ कहना चाहिए, क्योंकि उसके कथनसे इसके कथनमें कोई अन्तर नहीं है। * मायाकषायके प्रथम समयमें उपशामककी यह प्ररूपणा है । $ २४५. यह सत्र सुगम है। इस प्रकार इस प्ररूपणा द्वारा माया संज्वलनके असंख्यातगुणी श्रेणिरूपसे उपशमाये जानेवाले जीवके बहुत हजार स्थितिकाण्डकोंके व्यतीत
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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