SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 306
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गाथा १२३ ] चरित्तमोहणीय-उवसामणाए करणकजणिद्देसो २६३ पवेसुवलंभादो। तकाले चेव विदियद्विदीए आदिद्विदी वि अंतरद्विदीसु पविसदि त्ति एदेण कारणेण अंतरायोमो पढमद्विदिआयामो च अवढिदो चेव होदि । तदो एवंविहाणेण कीरमाणमंतरमंतोमुहुत्तेण कालेण पिल्लेविदमिदि सिद्धं ।। * ताधे चेव मोहणीयस्स आणुपुव्वीसंकमो, लोभस्स असंकमो, मोहणीयस्स एगट्ठाणिओ बंधो, णवंसयवेदस्स पढमसमयउवसामगो, छसु आवलियासु गदास उदीरणा, मोहणीयस्स एगट्ठाणिओ उदयो, मोहणीयस्स संखेजवस्सहिदिओ बंधो, एदाणि सत्तविहाणि करणाणि अंतरकदपढमसमए होंति ? तथा उसी समय द्वितीय स्थितिकी पहली स्थितिका भी अन्तरसम्बन्धी स्थितियों का प्रवेश हो जाता है, इसलिए इस कारणसे अन्तरायाम और प्रथमस्थितिसम्बन्धी आयाम अवस्थित ही होते हैं, इसलिये इस विधिसे किये जानेवाले अन्तरको अन्तर्मुहूर्त कालके द्वारा निर्लेप कर दिया जाता है यह सिद्ध हुआ। विशेषार्थ--यहाँपर जिन स्थितियोंका अन्तर करता है आदि कई बातोंका खुलासा करते हुए जो बतलाया है उसका खुलासा इस प्रकार है-(१) प्रथम स्थितिका जितना प्रमाण है उससे संख्यातगुणी स्थितियोंका अन्तर करता है जो प्रथम स्थिति और द्वितीय स्थितिके मध्य की स्थितियोंका किया जाता है । (२) गुणश्रेणीका जो अग्रभाग है उसके भी अप्रभागको और उससे भी संख्यातगुणी स्थितियोंको अन्तरके लिये ग्रहण करता है यह उक्त कथनका आशय है। किन्तु अन्तरकरणके कालमें जो कर्मबन्ध होता है उसकी आबाधा इससे भी अधिक होती है (३) यहाँ अन्तरके लिए गुणश्रेणिशीर्षके कितने भागको ग्रहण करता है इसका स्पष्टीकरण करते हुये बतलाया है कि अन्तर करते समय अनिवृत्तिकरणका जो संख्यातवाँ भाग काल शेष है और विशेष अधिक सूक्ष्मसाम्यरायका जितना काल होता है, इन दोनोंके बराबर अन्तरके लिये ग्रहण किया गया गणश्रेणीशीर्ष है। आगे सप्रमाण इसे ही स्पष्ट किया गया है। (४) अन्तरमेंसे उत्कीर्ण होनेवाली स्थितियाँ और प्रथम स्थिति इनका प्रमाण किस प्रकार अवस्थित है इसका स्पष्टीकरण करते हुये बतलाया है कि अन्तरको प्राप्त होनेवाली स्थितियोंमेंसे नीचे एक स्थितिके प्रथम स्थितिमें प्रवेश करनेपर ऊपर द्वितीय स्थितिमेंसे एक स्थिति अन्तरमें प्रवेश करती रहती है, इसलिये अन्तर क्रियाके होनेके अन्तिम समय तक ये दोनों अवस्थित प्रमाणवाले ही होते हैं । अन्तरकरणके समाप्त होनेपर मात्र प्रथम स्थितिमेंसे एक-एक स्थिति कम होने लगती है। (५) इस प्रकार जिन अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंके कर्मपुञ्जका निलेपन होता है वे कर्मपुञ्ज यथासम्भव प्रथम और द्वितीय स्थितिमें निक्षिप्त हो जाते हैं और इसलिये अन्तर सम्बन्धी स्थितियों मेंसे कर्मपुजका अभाव हो जाता है अर्थात् उतनी स्थितियाँ कर्मपुञ्जसे रहित हो जाती हैं । इतना यहाँ अवश्य ही ध्यान रखना चाहिये कि यह अन्तरकरण प्रकृतमें चारित्रमोहनीयकी शेष रहीं १२ कषाय और ९ नोकषायोंका ही होता है। * तभी मोहनीयका आनुपूर्वीसंक्रम, लोभसंज्वलनका असंक्रम, मोहनीयकर्मका एकस्थानीय बन्ध, नपुसकवेदका प्रथम समय उपशामक, छह अवलियोंके जानेपर उदीरणा, मोहनीयकर्मका एकस्थानीय उदय, मोहनीयकर्मका संख्यात वर्षकी स्थितिवाला बन्ध ये सात प्रकारके करण अन्तरकर चुकनेके प्रथम समयमें प्रारम्भ होते हैं।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy