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________________ गाथा १२३ ] चरित्तमोहणीय-उवसामणाए करणकजणिद्देसो २६१ * एदेण कमेण अंतरमुक्कीरमाणमुक्किण्णं । $ १५३. एदेणाणंतरपरूविदेण कमेण अंतोमुहुत्तमेत्तफालिसरूवेण पडिसमयमसंखेजगुणाए सेढीए उक्कीरिज्जमाणमंतरं चरिमफालीए उक्कीरिदाए णिरवसेसमुक्कीरिदं १. स्वोदय बन्धप्रकृतियाँ यथा-पुरुषवेद या अन्यतर संज्वलन । २. परोदयकी विवक्षामें बन्धप्रकृतियाँ । यथा-पुरुषवेद या अन्यतर संज्वलन । ३. अबन्धरूप उदयप्रकृतियाँ । यथा-स्त्रीवेद और नपुंसकवेद । ४. अबन्धरूप और अनुदयरूप प्रकृतियाँ। यथा-मध्यकी आठ कषाय और छह नोकषाय । अब इनकी अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंके प्रदेशपुंजका अन्यत्र निक्षेप किस प्रकार होता है इसका स्पष्टीकरण क्रमसे करते हैं -(१) जब पुरुषवेद और अन्यतर संज्वलनका बन्धके साथ उदय भी रहता है तब इनकी अन्तरसम्बन्धी स्थितियों के निषेकपुञ्जका एक तो प्रथम स्थिति में निक्षेप करता है, क्योंकि इनकी प्रथम स्थिति अन्तर्मुहूर्तप्रमाण पाई जाती है। दूसरे इनका उत्कर्षण होकर आबाधाको छोड़कर द्वितीय स्थितिमें निक्षेप करता है। आबाधाको इसलिये छुड़ाया है, क्योंकि उत्कर्षित द्रव्यका आबाधामें निक्षेप नहीं होता । (२) जब अन्यतर संज्वलन को छोड़कर शेष संज्वलनोंका और पुरुषवेदका केवल बन्ध होता है, उदय नहीं होता तब इनकी प्रथम स्थिति आवलिप्रमाण होनेसे इनकी अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंके निषेकपुञ्जका एक तो अपनी अपनी द्वितीय स्थितिमें निक्षेप करता है । दूसरे स्वयंको छोड़कर जो अन्य प्रकृतियाँ बँधती हैं उनकी भी प्रथम स्थिति आवलिप्रमाण होनेसे उनकी भी द्वितीय स्थितिमें निक्षेप करता है। तीसरे जो प्रकतियाँ उदयके साथ बँधती भी हैं उनकी प्रथम और द्वितीय स्थिति दोनोंमें निक्षेप करता है। (३) जब स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका जीवके उदय होता है तब इनकी अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंके निषेकपुञ्जका एक तो अपनी-अपनी प्रथम स्थितिमें निक्षेप करता है । दूसरे इस जीवके जिन संज्वलनों में से किसी एक का उदय होता है उसकी प्रथम और द्वितीय स्थितिमें निक्षेप करता है । तथा तीसरे उदयरूप विवक्षित संज्वलनको छोड़कर अन्य जो संज्वलन और पुरुषवेद मात्र बँधते हैं उनकी प्रथम स्थिति आवलिप्रमाण होनेसे उनकी द्वितीय स्थितिमें निक्षेप करता है । ( ४ ) अब रहे मध्यके आठ कषाय और छह नोकषाय सो न तो यहाँ इनका बन्ध ही होता है और न उदय ही होता है, अतः इनका, जो प्रकृतियाँ उस समय बँधती हैं उनकी द्वितीय स्थिति में, निक्षेप करता है और जो प्रकृतियाँ उस समय बन्ध और उदय दोनों रूप हैं उनकी प्रथम और द्वितीय दोनों स्थितियोंसे निक्षेप करता है । परन्तु उनका स्वस्थानमें निक्षेप नहीं होता । कारण स्पष्ट है । यहाँ प्रथम स्थितिमें निक्षेप अपकर्षण होकर होता है, द्वितीय स्थितिमें निक्षेप उत्कर्षण होकर होता है और एक प्रकृतिस्थितिका दूसरी प्रकृतिस्थितिमें निक्षेप परप्रकृति संक्रमपूर्वक यथासम्भव उत्कर्षण या अपकर्षण होकर होता है । शेष कथन मूलके अनुसार जान लेना चाहिये । * इस क्रमसे उत्र्कीण किया जानेवाला अन्तर उत्कीर्ण किया । $ १५३. इस अनन्तर पूर्व कहे गये क्रमसे अन्तर्मुहूर्तप्रमाण फालिरूपसे प्रति समय असंख्यातगुणी श्रेणिद्वारा उत्कीर्ण होनेवाला अन्तर अन्तिम फालिके उत्कीर्ण होनेपर पूरा
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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