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________________ गाथा १२३ ] चरितमोहणीय - उवसामणाए करणकज्जणिद्देसो २३९ भागेहिं ओसरिदूण बज्झमाणस्स पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागमेत्तसिद्धीए णिप्पड - धवलंभादो । * तस्स अप्पाबहुत्रं । $ ९४. तस्स तक्कालभावियस्स द्विदिबंधस्स सव्वेसु कम्मेसु पलिदोवमस्स संखेजदिभागपमाणेण पयट्टमाणस्स थोवबहुत्तमिदाणिं वत्तइस्सामो त्ति भणिदं होइ । * तं जहा । ९५. सुगमं । * णामा-गोदाणं द्विदिगंधो थोवो । ९९६. कुदो ९ पुव्यमेव पलिदोवमट्ठिदिगं बंध लद्ध पडिबद्धविदिबंधोसरणेहि सुट्ठ ओहट्टिदत्तादो । संखेजेहि संखेज गुणहाणि * मोहणीयवज्जाणं कम्माणं ठिदिबंधो तुल्लो संखेज्जगुणो । $ ९७. किं कारणं ? पच्छा अंतोमुहुत्तमुवरि गंतूणेदेसिं पलिदोवममेत्तट्ठिदिबंधसमुपत्तदो । * मोहणीयस्स द्विदिगंधो संखेज्जगुणो $ ९८. कुदो ! एकस्सेव संखेज्जगुणहाणिपडिबद्धट्ठिदिबंधोसरणस्स ताघे बन्ध पल्योपमके संख्यातवें भागमात्र सिद्ध होता है यह बिना बाधा के बन जाता है । * तत्काल होनेवाले स्थितिबन्धका अल्पबहुत्व | $ ९४. 'तस्' अर्थात् तत्काल प्रवृत्त हुए सब कर्मोंके पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण स्थितिबन्धका अल्पबहुत्व इस समय बतलावेंगे यह उक्त कथनका तात्पर्य है । * बह जैसे । $ ९५. यह सूत्र सुगम है । * नामकर्म और गोत्रकर्मका स्थितिबन्ध सबसे अल्प है । $ ९६. क्योंकि पूर्व में ही पल्योपम स्थितिवाले बन्धको प्राप्तकर संख्यात गुणहानियोंसे प्रतिबद्ध संख्यात स्थितिबन्धापसरणोंके द्वारा उक्त स्थितिबन्धको बहुत अधिक कम कर दिया गया है । * उससे मोहनीय कर्मके अतिरिक्त कर्मोंका स्थितिबन्ध परस्पर तुल्य होकर संख्यातगुणा है । $ ९७ क्योंकि पीछे की ओर अन्तर्मुहूर्त ऊपर जाकर इन कर्मोंका पल्योपमप्रमाण स्थितिबन्ध उत्पन्न हुआ था । * उससे मोहनीय कर्मका स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है । $ ९८, क्योंकि तब मोहनीय कर्मविषयक एक ही संख्यात गुणहानिरूप स्थितिबन्धाप
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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