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________________ ( २४ ) बारह कषाय और नौ नोकषाय इन इक्कीस प्रकृतियोंका अन्तरकरण होता है। उनमेंसे चार संज्वलन और पुरुषवेदका ही यहाँ बन्ध सम्भव है, शेषका नहीं। किन्तु उदय चार संज्वलनोंमेंसे किसी एकका और तीन वेदोंमेंसे किसी एकका होता है। शेष मध्यकी आठ कषाय और छह नोकषाय ये अबन्ध और अनुदयरूप प्रकृतियाँ हैं। तदनुसार ये सब प्रकृतियाँ चार भागोंमें विभक्त हो जाती हैं । यथा १. स्वोदयकी विवक्षामें बन्धके साथ उदय प्रकृतियाँ-पुरुषवेद और अन्यतर संज्वलन । २. परोदयकी विवक्षामें बन्धप्रकृतियाँ-पुरुषवेद और अन्यतर संज्वलन । ३. स्वोदयकी विवक्षामें अबन्धरूप उदयप्रकृतियाँ-स्त्रीवेद और नपुंसकवेद। . ४. अबन्धरूप अनुदयप्रकृतियाँ-मध्यकी आठ कषाय और छह नोकषाय । इसप्रकार उक्त २१ प्रकृतियाँ चार भागों में विभक्त हो जाती हैं। इनमें से (१) जिसके पुरुषवेद और अन्यतर संज्वलनका बन्धके साथ उदय भी होता है उसके इन दोनों प्रकृतियोंको अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंके निषेकपुञ्जका अपकर्षण होकर एक तो प्रथम स्थितिमें निक्षेप होता है, क्योंकि उक्त अवस्थामें इनकी प्रथम स्थिति अन्तर्मुहूर्तप्रमाण पाई जाती है। दूसरे इनके उक्त निषेकपुञ्जका उत्कर्षण होकर आबाधाको छोड़कर बन्ध प्रकृतियोंकी द्वितीय स्थितिमें निक्षेप होता है । उत्कर्षित द्रव्यका आबाधामें निक्षेप नहीं होता ऐसा नियम होनेसे आबाधामें उक्त द्रव्यका निक्षेप नहीं होता है ऐसा कहा है। ( २ ) जिसके अन्यतर संज्वलनको छोड़कर शेष संज्वलनोंका तथा पुरुषवेदका उदय नहीं होता, केवल बन्ध होता है उसके तब इनकी प्रथम स्थिति मात्र आवलिप्रमाण होनेसे इनकी अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंके निपेकपुञ्जका एक तो अपनी द्वितीय स्थितिमें उत्कर्षण होकर निक्षेप होता है, दूसरे जो अनुदयरूपबन्ध प्रकृतियाँ हैं उनकी भी द्वितीय स्थितिमें उत्कर्षण होकर निक्षेप होता है और तीसरे जो उदयसहित बन्ध प्रकृतियाँ हैं उनकी प्रथम स्थितिमें अपकर्षण होकर और द्वितीय स्थितिमें उत्कर्षण होकर निक्षेप होता है । ( ३ ) जो स्त्रीवेद या नपुंसकवेदके उदयसे श्रेणि चढ़ा है उसके इन दोनों प्रकृतियोंकी अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंके निषेकपुञ्जका एक तो अपकर्षण होकर अपनी प्रथम स्थितिमें निक्षेप होता है, दूसरे जो केवल बन्ध प्रकृत्तियाँ हैं उनकी द्वितीय स्थितिमें परप्रकृतिसंक्रमरूपसे उत्कर्षण होकर निक्षेप होता है और तीसरे जो सोदय बन्ध प्रकृतियाँ हैं उनकी प्रथम स्थितिमें परप्रकृतिसंक्रमरूपसे अपकर्षण होकर और द्वितीय स्थितिमें उत्कर्षण होकर निक्षेप होता है तथा (४) अबन्ध और अनुदयरूप जो आठ कक्षाय और छह नोकषाय हैं उनके अन्तरसम्बन्धी निषेकपुजका एक तो जो कर्म बँधते हैं वेदे नहीं जाते उनकी द्वितीय स्थितिमें परप्रकृति संक्रमरूपसे उत्कर्षण होकर निक्षेप होता है, दूसरे जो कर्म बँधते हैं और वेदे जाते हैं उनकी परप्रकृतिसंक्रमरूपसे अपकर्षण होकर प्रथम स्थिति में और उत्कर्षण होकर द्वितीय स्थिति में निक्षेप होता है। तथा तीसरे जो कर्म बँधते नहीं, वेदे जाते हैं उनकी प्रथम स्थितिमें परप्रकृतिसंक्रमरूपसे अपकर्षण होकर निक्षेप होता है। इस प्रकार इस विधिसे अन्तरकरण क्रिया सम्पन्न हो जानेपर उसके समाप्त होनेके समयसे लेकर चारित्रमोहनीयके ये सात करण प्रारम्भ हो जाते हैं। यथा-(१) चारित्र मोहनीयकी वहाँ अवस्थित सभी प्रकृतियोंका आनुपूर्वी संक्रम होने लगता है। खुलासा इस प्रकार है-स्त्रीवेद' और नपुंसकवेदका नियमसे पुरुषवेदमें संक्रम होता है, अन्यत्र संक्रम
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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