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________________ गाथा ११४ ] अणियट्टिकरणे कज्जविसेसपरूवणा ७९ एवं जाव दुचरिमणिसेगो ति । णवरि हेट्ठिमाणंतरणिसेगगुणगारादो उवरिमाणंतरणिसेगगुणगारो असंखेज्जगुणवड्डीए सव्वत्थ णेयव्वो । कुदो एदं णव्वदे ? पुव्वाइरियवक्खाणादो। तदो दुचरिमणिसेगादो गुणसेढिसीसए असंखेजगुणं पदेसग्गं देदि । संपहि को एत्थ गुणगारो त्ति आसंकाए तण्णिण्णयकरणटुं सुत्तमुत्तरं भणइ-- ___ * गुणगारो वि दुचरिमाए हिदीए पदेसग्गादो चरिमाए द्विदीए पदेसग्गस्स असंखेन्जाणि पलिदोवम [ पढम] वग्गमूलाणि । ___१०३. दुचरिमाए ट्ठिदीए णिसित्तपदेसग्गं पेक्खियूण चरिमाए गुणसेढिअग्गद्विदीए णिसिंचमाणदव्वस्स जो गुणगारो सो पलिदोवमपढमवग्गमूलस्स असंखेज्जदिभागो वा अण्णो वा ण होदि, किंतु असंखेज्जपलिदोवमपढमवग्गमूलपमाणो त्ति एदेण जाणाविदं । किं कारणमेम्महतो गुणगारो एत्थ जादो त्ति णासंकणिज्जं हेट्ठा णिसित्तासेसदव्वस्स चरिमफालिदव्वमसंखेज्जपलिदोवमपढमवग्गमूलेहिं खंडिदेयखंडपमाणत्तब्भुवगमादो। एदेण हेडिमासेसगुणगाराणं तप्पाओग्गपलिदोवमापल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण अंक गुणकार हैं। इस प्रकार द्विचरम निषेकके प्राप्त होने तक जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि अधस्तन अनन्तर निषेकके गुणकारसे उपरिम अनन्तर निषेकका गुणकार सर्वत्र असंख्यातगुणी वृद्धिरूपसे ले जाना चाहिए। शंका—यह किस प्रमाणसे जाना जाता है ? समाधान–पूर्वाचार्योंके व्याख्यानसे जाना जाता है। इसके बाद द्विचरमनिषेकसे गुणश्रेणिशीर्ष में असंख्यातगुणे प्रदेशपुञ्जको देता है। अब यहाँ पर गुणकार क्या है ऐसी आशंका होने पर उसका निर्णय करनेके लिये आगेके सूत्रको कहते हैं * द्विचरम स्थितिके प्रदेशपुञ्जसे अन्तिम स्थितिके प्रदेशपुजका गुणकार पन्योपमके असंख्यात प्रथम वर्गमूलप्रमाण है। $१०३. द्विचरम स्थितिमें जो प्रदेशपुञ्ज निक्षिप्त होता है उसे देखते हुए गुणश्रेणिकी अन्तिम अग्र स्थितिमें निक्षिप्त होनेवाले द्रव्यका जो गुणकार है वह न तो पल्योपमके प्रथम वर्गमूलका असंख्यातवाँ भाग है और न अन्य ही है, किन्तु पल्योपमके असंख्यात प्रथम वर्गमूल प्रमाण है यह इससे जनाया गया है। शंका-यहाँ पर इतना बड़ा गुणकार किस कारणसे हो गया है ? समाधान-ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि नीचे निक्षिप्त किया गया द्रव्य अन्तिम फालिके द्रव्यको पल्योपमके असंख्यात प्रथम वर्गमूलोंसे भाजितकर जो एक भाग लब्ध आवे तत्प्रमाण स्वीकार किया गया है। इस कथन द्वारा अधस्तन समस्त गुण
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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