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________________ गाथा ११४ ] अट्टिकरणे कज्जविसेसपरूवणा $ ८४. जं सम्मत्ताणुभागम्स पुव्वं विट्ठाणियसरूवस्स एण्डिमेगट्ठाणियसरूवेणाणुसमयोवट्टणा पारद्धा ति । पुव्वमंतोमुहुत्तेण कालेणाणुभागखंडयं णिव्वत्तेदि । इदाणिं पुण खंडयघादमुवसंहरियूण समए समए सम्मत्तस्स अणुभागमणंतगुणहाणीए ओवट्टेदि ति वुत्तं होइ । तं पुण अणुसमयोवट्टणमेवमणुगंतव्त्रं - अनंतरहेट्टिम - समयाणुभागसंतकम्मादो संपहियसमये अणुभागसंतकम्ममुदयावलियबाहिरमणंतगुणहीणं fosमुदावलिया हिराणु भागसंतकम्मादो उदयावलियन्मंतरमणुष्पविसमाणमणंतगुणहीणं तत्तो वि उदयसमयं पविसमाणमणंतगुणहीणं । एवं समये समये जाव समयाहियावलियअक्खीणदंसणमोहो ति । तत्तो परमावलियमेत्तकालमुदयं पविसमाणाभागस्स अणुसमयोवट्टणाति । * अंतोमुहुत्तिगं चरिमट्ठिदिखंडयं । ६३ $ ८४. पहले जो सम्यक्त्वका अनुभाग द्विस्थानीयस्वरूप रहा है उसकी अब एक स्थानीय रूप से प्रतिसमय अपवर्तना प्रारम्भ हुई। पहले अन्तर्मुहूर्त काल द्वारा अनुभागकाण्डककी रचना करता था अब पूर्वके काण्डकघातका उपसंहारकर प्रत्येक समय में सम्यक्त्वके अनुभागकी अनन्तगुणी हानिरूपसे अपवर्तना करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । पुनः प्रत्येक समय में होनेवाली अपवर्तनाको इसप्रकार जानना चाहिए - अनन्तर पूर्व समय के अनुभाग सत्कर्म से वर्तमान समय में अनुभागसत्कर्म उदयावलिसे बाहर अनन्तगुणा हीन है । उदयावलिके बाहर स्थित इस अनुभागसत्कर्मसे उदद्यावलिके भीतर अनुप्रविशमान अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन है । इसप्रकार दर्शनमोहनीयके क्षय होनेके एक समय अधिक एक आवलिपूर्व तक प्रत्येक समय में इसीप्रकार जानना चाहिए। उसके बाद एक आवलिप्रमाण कालतक उदय में प्रविशमान अनुभागकी प्रतिसमय अपवर्तना पाई जाती है । विशेषार्थ – सम्यक्त्वप्रकृतिका स्थितिसत्कर्म आठ वर्षप्रमाण रह जानेपर क्या-क्या क्रियाविशेष होते हैं इस तथ्यका स्पष्टीकरण करते हुए सर्वप्रथम अनुभाग-सम्बन्धी क्रियाविशेषका निर्देश करते हुए बतलाया है कि इससे पूर्व सम्यक्त्वसम्बन्धी एक-एक अनुभागकाण्डका अन्तर्मुहूर्त - अन्तर्मुहूर्त कालमें घात करता था । अव प्रत्येक समय में सम्यक्त्वके अनुभागका अनन्तगुणी हानिरूपसे अपवर्तन करता है । उसमें भी पहले जो द्विस्थानीय अनुभाग था उसका प्रत्येक समय में एक स्थानीयरूपसे अपवर्तन करने लगता है । उसी तथ्यको यहाँ स्पष्टरूपसे समझाते हुए बतलाया है कि अनन्तर पूर्व समय में जो अनुभागसत्कर्म था उससे वर्तमान समय में उदद्यावलिके बाहर स्थित अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा ही होता है। तथा इस उदयावलिके बाहर स्थित अनुभागसत्कर्मसे उदद्यावलिमें अनुप्रविशमान अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन होता है । इसप्रकार इस क्रमको दर्शनमोहनीय के क्षय होने में एक समय अधिक एक आवलि काल शेष रहने तक जानना चाहिए । उसके बाद आवलिमात्र काल तक उदयमें प्रविशमान अनुभागको अनुसमय अपवर्तना है । * अन्तर्मुहूर्त स्थितिवाला अन्तिम स्थितिकाण्डक होता है । १. ता० प्रती 'जं सम्मत्ताणुभागं' इत्यतः पारद्वा त्ति' इति यावत् सूत्रांशरूपेण निर्दिष्टम् ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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