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________________ गाथा ११४ ] अयि किरणे कज्जविसेसपरूवणा ६१ 1 करण पढमसमये ताव सव्वरहस्साए उदयावलियबाहिराणंतरद्विदीए जं पदेसग्गं णिक्खिवदि तं थोवं होड़ । हतं पि असंखेजसमयपबद्धपमाणमिदि धेत्तव्वं, सव्वजहणणे वि गुणसेढिगोवुच्छप लिदोवमा संखेज्जभागमेत्ताणं पंचिंदियसमयपवद्धाणमुवलंभादो । एतो समयुत्तराए हिदीए जं पदेसग्गं णिसिंचदि तमसंखेज्जगुणं । को गुणगारो १ तप्पाओग्गो पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो । एवं जाव गुणसेढिसीसयं पावेइ ताव असंखेजगुणं चेव देदि । तदो गुणसेढिसीसयादो उवरिमाणंतराए ट्ठिदीए असंखेज्ज - गुणही पदेसग्गं देदि । किं कारणं ? तक्कालोकड्डिदसयलदव्बं तप्पा ओग्गपलिदोवमासंखेज्जभागमेत्तभागहारेण खंडिदेयखंडमसंखेज्जभागूणं गुणसेढिसीसये णिक्खिविय पुणो से बहुभागे दिवड गुणहाणीहिं खंडिदेयखंडमणं तरोवरिमाए हिदीए णिक्खिवदि त्ति एदेण कारणेण तत्थ दिज्जमाणं पदेसग्गमेयसमयपबद्धासंखेज्जदिभागपमाणं होदूणासंखेजगुणहीणं जादं । तदो विसेसहीणं देदि । केत्तियमेत्तेण ? दोगुणहाणि - पडिभागिएण गोच्छविसेसेण । एवमुवरिमासु वि द्विदीसु वि विसेसहीणं चैव देदि जाव अष्पष्पणो ओकड्डिदद्विदिमइच्छावणावलियमेत्तणापत्तोति । एसा दिज्जमाणपरूवणा । एवं चैव दिस्समाणस्स वि परूवणा कायव्वा, विसेसाभावादो । एवं चैव विदियादिसमसु वि कायव्वं जाव पलिदोवमस्सा संखेज्जदिभाग मेत्तचरिमट्ठिदिखंडयं सर्वप्रथम अपूर्वकरणके प्रथम समय में उदयावलि बाह्य सबसे हस्व अनन्तर स्थितिमें जिस प्रदेशको निक्षिप्त करता है वह स्तोक होता है । स्तोक होता हुआ भी असंख्यात समयप्रबद्धप्रमाण होता है ऐसा ग्रहण करना चाहिए, क्यों कि सबसे जघन्य होने पर भी गुणश्रेणिगोपुच्छ में पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण पञ्चेन्द्रियसम्बन्धी समयप्रबद्ध पाये जाते हैं। इससे एक समय आगेकी स्थितिमें जिस प्रदेशपुञ्जको निक्षिप्त करता है वह उससे असंख्यातगुणा होता है । गुणकार क्या है ? तत्प्रायोग्य पल्योपमका असंख्यातवाँ भागप्रमाण गुणकार है । इस प्रकार गुणश्रेणिशीर्षके प्राप्त होने तक उत्तरोत्तर प्रत्येक स्थितिमें असंख्यात - गुणा देता है । तदनन्तर गुणश्रेणिशीर्ष से उपरिम अनन्तर स्थितिमें असंख्यातगुणा हीन प्रदेशपुञ्ज देता है, क्योंकि उस समय अपकर्षित समस्त द्रव्यको तत्प्रायोग्य पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण भागहारसे भाजित कर जो एक भाग लब्ध आवे असंख्यातवाँ भाग कम उसे गुणश्रेणिशीर्ष में निक्षिप्त कर पुनः शेष बहुभागको डेढ़ गुणहानिसे भाजित कर जो एक भाग लब्ध आवे उसे अनन्तर उपरिम स्थिति में निक्षिप्त करता है इसप्रकार इस कारण से वहाँ दिया जानेवाला प्रदेशपुञ्ज एक समयप्रबद्धका असंख्यातवें भागप्रमाण होकर असंख्यात - गुणा हीन हो गया । तदनन्तर उपरिम स्थितिमें विशेष हीन देता है । कितना विशेषहीन देता है ? दो गुणहानियोंके प्रतिभागसे प्राप्त गोपुच्छविशेषसे हीन देता है । इसप्रकार उपरिम स्थितियों में भी, अपनी-अपनी अपकर्षित स्थितिकी अतिस्थापनावलिके प्राप्त होनेके पूर्वतक, विशेषहीन- विशेषहीन देता है । यह दीयमान प्रदेशपुजकी प्ररूपणा है । दृश्यमान प्रदेशपुब्ज की प्ररूपणा भी इसी प्रकार करनी चाहिए, क्योंकि उससे इसमें कोई भेद नहीं है । इसी प्रकार पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण अन्तिम स्थितिकाण्डक
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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