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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे गुणहीणाणमेदेसिं तहाभावसिद्धीए णिव्वाहमुवलंभादो । * जम्हि माणोवजोगा संखेज्जा तम्हि कोहोवजोगा संखेज्जा वा असंखेज्जा वा । $ ९३. जम्हि णेरइयभवग्गहणे माणोवजोगा संखेज्जा तम्हि कोहोवजोगा संखेजा चेवेति णत्थि नियमो, किंतु संखेज्जा वा असंखेज्जा वा होंति । किं कारणं ? उक्कस्ससंखेज्जमेत्ते माणोवजोगेसु जादेसु तत्तो विसेसाहियाणं कोहोवजोगाणमसंखेजत्तदंसणादो । उक्कस्ससंखेजादो पुण हेट्ठा तप्पा ओग्गसंखेज मेत्तेसु जादेसु दोन्हं पि अष्पष्पणो पडिभागेण संखे जाणमुवजोगाणमुवलंभादो । ४६ [ उवजोगो ७ * मायोवजोगा लोहोवजोगा णियमा संखेज्जा । ९४. कुदो ? माणोवजोगेसु संखेजेस संतेसु तत्तो संखेञ्जगुणहीणाणमेदेसिं ताभावसिद्धीए णाइयत्तादो । * जम्हि मायोवजोगा संखेज्जा तम्हि कोहोवजोगा माणोवजोगा संखेज्जा वा असंखेज्जा वा । $ ९५. कुदो मायोवजोगेसु उक्कस्ससंखेज्जमेत्तेसु जादेसु तत्तो संखेज्जगुणाणं कोह- माणोवजोगाणमसंखेज्जत्तुवलंभादो, तत्तो संखेञ्जगुणहीणमद्धाणमोदरिय हेडा संख्यातरूप होनेकी सिद्धि निर्बाधरूपसे पाई जाती है । * नारकियोंके जिस भवमें मानकषायके उपयोग संख्यात होते हैं उस भवमें क्रोधकषायके उपयोग संख्यात अथवा असंख्यात होते हैं । ९३. नारकियोंके जिस भवमें मानकषायके उपयोग संख्यात होते हैं उस भवमें क्रोधकषायके उपयोग संख्यात ही होते है यह नियम नहीं है । किन्तु संख्यात या असंख्यात होते हैं शंका — इसका क्या कारण है ? समाधान—मानकषायके उपयोग उत्कृष्ट संख्यात प्रमाण हो जाने पर उनसे विशेष अधिक क्रोधकषायके उपयोग असंख्यात देखे जाते हैं । परन्तु उत्कृष्ट संख्यातसे नीचे तत्प्रायोग्य संख्यातप्रमाण उपयोगोंके होनेपर दोनोंके ही अपने-अपने प्रतिभागके अनुसार संख्यात उपयोग पाये जाते हैं । * मायाकषायके उपयोग और लोभकषायके उपयोग नियमसे संख्यात होते हैं । $ ९४. क्योंकि मानकषायके उपयोगोंके संख्यात होनेपर उनसे संख्यातगुणे हीन उक्त दोनों कषायोंके उपयोगोंका संख्यात सिद्ध होना न्यायप्राप्त है । * नारकियोंके जिस भवमें मायाकषायके उपयोग संख्यात होते हैं उस भव में क्रोधकषायके उपयोग और मानकषायके उपयोग संख्यात अथवा असंख्यात होते हैं । $ ९५. क्योंकि मायाकषायके उपयोगोंके उत्कृष्ट संख्यातप्रमाण होनेपर उनसे संख्यातगुणे क्रोध और मानकषायके उपयोग असंख्यात पाये जाते हैं । तथा वहाँसे संख्यातगुणे हीन
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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