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________________ गाथा ६४ ] विदियगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा * एत्तो विदियगाहाए विभासा । $ ८४. तो पढमगाहाविहासणादो अणंतरमिदाणिं विदियगाहाए विहासा अहिकीरदित्ति भणिदं होइ । * तं जहा । $ ८५. सुगममेदं पुच्छावक्कं । ४३ * एकम्मि भवग्गहणे एक्ककसायम्मि कदि च उवजोगा त्ति । $ ८६. एदस्स ताव गाहापुव्वद्धस्स अत्थविहासणं' कस्सामो त्ति भणिदं होइ । एदम्मि गाहापुत्र णिरयादिगदीसु संखेज्जवस्सियमसंखेज्जवस्सियं वा भवग्गहणमाहारं काढूण तत्थेगेगस्स कसायस्स केत्तिया उवजोगा होंति, किं संखेज्जा असंखेजा वा ति पुच्छाणिद्देसेण उवरिमसव्वपरूवणा संगहिया त्ति गहेयव्वं । संपहि एवं विहत्थविसेसपडिबद्धस्सेदस्स गाहापुव्वद्धस्स णिरयगइसंबंधेणत्थविहासणं कुणमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ * एक्कम्मि णेरहयभवग्गहणे को होवजोगा संखेज्जा वा असंखेज्जा वा । ८७. एकमि रइयभवग्गहणे णिरुद्धे तत्थ कोहोवजोगा केत्तिया होंतिि संखेज्जा वा असंखेज्जा वा होंति त्ति भणिदं । तं जहा — दसवस्ससहस्सप्प हुडि कोहो - * इससे आगे अब दुसरी गाथाकी विभाषा करते हैं । $ ८४. 'एत्तो' अर्थात् प्रथम गाथाका विशेष विवेचन करनेके बाद अब दूसरी गाथाका विशेष विवेचन अधिकृत है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । * वह कैसे ? $ ८५. यह पृच्छावाक्य सुगम है । * एक भवग्रहणके भीतर एक कषायके कितने उपयोग होते हैं । $ ८६• सर्व प्रथम इस गाथाके पूर्वार्धका विशेष विवेचन करेंगे यह उक्त कथनका तात्पर्य है । नरकादि गतियों में संख्यात वर्षवाले और असंख्यात वर्षवाले भवग्रहणको आधार बना कर वहाँ एक-एक कषायके कितने उपयोग होते हैं - क्या संख्यात उपयोग होते हैं या असंख्यात उपयोग होते हैं इस प्रकार इस गाथाके पूर्वार्ध में पृच्छा के निर्देश द्वारा आगेकी समस्त प्ररूपणा संगृहीत की गई है ऐसा यहाँ पर ग्रहण करना चाहिए। अब इस प्रकार के अर्थविशेषसे सम्बन्ध रखनेवाले गाथाके इस पूर्वार्धके अर्थका नरकगतिके सम्बन्धसे विशेष व्याख्यान करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं - * नारकियोंके एक भवग्रहणके भीतर क्रोधकषायके उपयोग संख्यात अथवा असंख्यात होते हैं । $ ८७. नरकियोंके एक भवग्रहणके विवक्षित होनेपर उसमें क्रोधसम्बन्धी उपयोग कितने होते हैं ऐसी पृच्छा होने पर संख्यात अथवा असंख्यात होते हैं यह कहा है । यथा— १. ता० प्रती अ [ अ ] विहासणं आ० प्रतो अविहासणं इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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