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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो७ * चोदसण्हं जीवसमासाणं देव-णेरइयवजाणं जहणिया माणद्धा तुल्ला थोवा। ५२. एत्थ 'चोद्दसण्हं जीवसमासाणं' इदि वयणेण देव-णेरइयाणं पि सण्णिपंचिंदियपज्जत्तापजत्तजीवसमासंतभूदाणं गहणे पसत्ते तव्वुदासकरणटुं 'देव-णेरइयवज्जाणं' इदि भणिदं । किमर्स्ट तेसिं परिवज्जणं कीरदे ? ण, सेसजीवसमासेहिं सह तेसिं माणादि-जहण्णोवजोगद्धासारिच्छणिबंधणपच्चासत्तीए अभावपदुप्पायणटुं तहाकरणादो । तदो देव-णेरइए मोत्तूण सेसासेसजीवसमासाणं जहणिया माणद्धा सरिसी होदूण सव्वत्थोवा त्ति गहेयव्वं । * जहणिया कोधद्धा विसेसाहिया। $५३. एत्थाहियारवसेण चोदसण्हं जीवससासाणं देव-णेरइयवज्जाणं जहणिया कोधद्धा तुल्ला होदूण विसेसाहिया ति सुत्तत्थसंबंधो कायव्यो । केत्तियमेत्तो विसेसो ? आवलियाए असंखेज्जदिमागमेत्तो। * जहणिया मायद्धा विसेसाहिया । * जहणिया लोभद्धा विसेसाहिया । * सुहुमस्स अपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया माणद्धा संखेनगुणा । * देव और नारकियोंको छोड़कर चौदह जीवसमासोंमें मानका जघन्य काल परस्पर तुल्य होकर सबसे थोड़ा है। ५२. यहाँपर 'चोद्दसण्हं जीवसमासाणं' इस वचनसे संज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त और संज्ञी पश्चेन्द्रिय अपर्याप्त जीवसमासोंमें अन्तर्भूत हुए देव और नारकियोंका ग्रहण प्राप्त होने पर उनका निराकरण करनेके लिए 'देव-णेरइयवज्जाणं' यह वचन कहा है। शंका-उनका निषेध किस लिए करते हैं। समाधान नहीं, क्योंकि शेष जीवसमासोंके साथ उनके मानादि सम्बन्धी जघन्य उपयोग कालके सदृश होनेके कारणकी प्रत्यासत्तिका अभाव है यह कहनेके लिए उस प्रकारसे सूत्रवचन निर्दिष्ट किया है। इसलिए देव और नारकियोंको छोड़कर शेष समस्त जीवसमासोंमें मानका जघन्य काल परस्पर सदृश होकर सबसे थोड़ा है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। * उससे क्रोधका जघन्य काल विशेष अधिक है। ६५३. यहाँ अधिकारवश देव और नारकियोंको छोड़कर चौदह जीवसमारों में क्रोधका जघन्य काल परस्पर तुल्य होकर विशेष अधिक है ऐसा सूत्रका अर्थके साथ सम्बन्ध करना चाहिये। शंका-विशेषका प्रमाण कितना है ? समाधान-आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। * उससे मायाका जघन्य काल विशेष अधिक है। * उससे लोभका जघन्य काल विशेष अधिक है। * उससे सूक्ष्म अपर्याप्तकके मानका उत्कृष्ट काल संख्यातगुणा है।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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