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________________ गाथा ६९ ] गाहासुत्ताणं अत्थपरूवणा ११ गवेसण मोण्णा । तं कथं ? 'जे जे जम्हि कसाये ०' एवं भणिदे जे जे जीवा जम्हि कसायम्मि कोहादीणमण्णदरे वट्टमाणसमयम्मि उवजुत्ता दीसंति, 'किण्णु भूदपुव्वा ते ' ते जीवा अणूणाहिया संता विवक्खियकसायोवजोगेण किंण्णु भूदपुव्वा संजादा, अदीदकाले तेणेव कसायोवजोगेण एक्कम्मि चेव समए तेत्तियमेत्ता चेव होदूण किण्णाम परिणदा त्ति पुच्छा कदा होइ । 'होहिंति च उवजुत्ता' एदेण अणागदकालविसयो पुच्छाणिसो कओ । एत्थ जइ वि उवरिमचुण्णिसुत्ते अणागयकालविसया परूवणा त्थ तो वि एसो अत्थो एदम्मि गाहासुत्तपच्छिम पडिबद्धो त्ति गहेयव्वं, मुत्तकंठमेव णिद्दित्तादो । चुण्णिसुत्ते पुण तदपरूवणा अदीदकालपरूवणादो चेव गयत्थत्तपदुपायणडुमिदि ण किं चि विरुद्धं । एवमेसो ओघपरूणाविसयो पुच्छाणिद्देसो । पुणो आदेसेण वि गदियादिमग्गणासु एसो अत्थो अणुमग्गियन्वो त्ति पदुष्पाय णट्ठमिदमाह 'एवं सव्वत्थ बोद्धव्वा' ति । एवमेदस्स छट्ठगाहासुत्तस्स पडिबद्धत्थपरूवणं काढूण संपहि सत्तमगाहासुत्तस्स पडिबद्धत्थपरूवणमवयारो कीरदे— (१६) उवजोगवग्गणाहि य अविरहिदं काहि विरहिदं चावि । पढमसमयोवजुत्तेहिं चरिमसमए च बोद्धव्वा ||७-६६ ॥ रहे हैं या करते रहेंगे इस बातकी सम्भावना और असम्भावनाका अनुसन्धान करनेके लिए यह गाथा अवतीर्ण हुई है । शंका- वह कैसे ? समाधान - 'जे जे जम्हि कसाए०' ऐसा कहनेपर जो जो जीव वर्तमान समय में क्रोधादिमेंसे अन्यतर जिस कषायमें उपयुक्त दिखलाई देते हैं, 'किष्णु भूदपुव्वा ते' न्यूनाधिकता से रहित वे सब जीव क्या अतीत कालमें विवक्षित कषाय में उपयुक्त थे अर्थात् अतीत कालमें एक ही समय में उतने ही वे सब जीव क्या उसी कपायके उपयोगसे परिणत रहे हैं। यह पृच्छा की गई है । 'होहिंति च उवजुत्ता' इस वचन द्वारा अनागत काल विषयक पृच्छाका निर्देश किया गया । यहाँ यद्यपि आगे चूर्णिसूत्र में अनागत काल विषयक प्ररूपणा नहीं की गई है तो भी यह अर्थ इस गाथासूत्र के उत्तरार्ध में निबद्ध है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि मुक्तकण्ठ होकर इसका गाथासूत्र में निर्देश उपलब्ध होता है। चूर्णिसूत्र तो अतीत कालविषयक प्ररूपणासे ही वह गतार्थ है, इसलिए उसका निर्देश नहीं किया है, अतः इसमें कुछ भी विरुद्ध नहीं है। इस प्रकार यह ओघप्ररूपणाविषयक पृच्छाका निर्देश है । पुनः आदेश से भी गति आदि मार्गणाओंमें इस अर्थका अनुसन्धान कर लेना चाहिए इस प्रकार इस बातका कथन करनेके लिए यह वचन कहा है- 'एवं सव्वत्थ बोद्धव्वा' । इस प्रकार इस छठे गाथासूत्र में निबद्ध अर्थका कथन करके अब सातवें गाथासूत्र में निबद्ध अर्थका कथन करनेके लिए अवतार करते हैं * कितनी उपयोगवर्गणाओंसे कौन स्थान युक्त पाया जाता है और कौन स्थान रहित पाया जाता है । तथा प्रथम समयमें उपयुक्त जीवोंसे लेकर अन्तिम समय तक जानना चाहिए ||७-६९ ॥
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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