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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ एगसमएणे त्ति अत्थो थेत्तव्यो। जइ णिरुद्धगदीए सव्वो जीवरासी एगसमयम्मि एक्केणेव कसाएण परिणदो होज्ज तो सरिसमुवजुत्ता णाम होइ, अण्णहा विसरिसमुवजुत्तो ति भण्णदे, जीवसमूहवदिरित्ताए गदीए अणुवलंभादो। ११. संपहि पवाइज्जतेणुवएसेणत्थे भण्णःणे अण्णो कसायो अण्णो च अणुभागो त्ति दोण्हं भेदविवक्खियं कादूण सुत्तत्थघडावणं कीरदे । तं जहा—'एक्कम्हि अणुभागे त्ति वुत्ते एगकसायुदयट्ठाणे त्ति घेत्तव्वं । 'एक्ककसायम्हि' त्ति वुत्ते कोहादीणमण्णदरकसायस्स गहणं कायव्वं, अणुभागादो तस्स कथंचि पुधभावोवलंभादो । 'एक्ककालेणे त्ति भणिदे एगकालोवजोगवग्गणाए गहणं कायव्वं । तदो एगस्स कसायस्स एगम्मि कसायोदयहाणे एगकसायोवजोगट्ठाणे च सरिसमुवजुत्ता का च गदी होदि त्ति पुच्छासंबंधो कायव्यो । अयं पुनरत्र वाक्यार्थः-कोहादिकसायाणं मज्झे एक्केकस्स कसायस्स असंखेज्जलोगमेत्तकसायुदयट्ठाणाणि संखेज्जावलियमेत्तकसायोवजोगट्ठाणाणि च अस्थि । तत्थेगस्स कसायस्स एगकसायुदयट्ठाणे एगकसायजोगद्धट्ठाणे च एकम्मि समये उवजुत्ता का च गदी होदि । किं सव्वेसिं जीवाणमेक्कवारेण तहापरिणामसंभवो अत्थि आहो पत्थि त्ति पुच्छिदं होइ। $ १२. 'विसरिसमुवजुज्जदे का च' एवं भणिदे दोसु कसायुदयट्ठाणेसु तिसु वा कसायु-उदयट्ठाणेसु एदेण विधिणा गंतूण जाव संखेज्जासंखेज्जकसायुदयट्ठाणेसु वा कहने पर एक समयमें ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिए। यदि विवक्षित गतिमें सब जीवराशि एक समयमें एक ही कषायरूपसे परिगत होवे तो सदृश उपयुक्त संज्ञावाली वह जीवराशि कहलाती है, अन्यथा विसदृश उपयुक्त संज्ञावाली कही जाती है, क्योंकि जीवसमूहसे भिन्न गति नहीं पाई जाती है। ११. अब प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार यहाँ कथन करने पर अन्य कषाय है और अन्य अनुभाग है इस प्रकार दोनोंमें भेदविवक्षा करके सूत्रके अर्थको घटित करते हैं । यथा'एक्कम्हि अणुभागे' ऐसा कहने पर उसका अर्थ एक कषाय उदयस्थान लेना चाहिए। 'एक्ककसायम्हि' ऐसा कहने पर क्रोधादिमेंसे अन्यतर कषायको ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि अनुभागसे कषायमें कथंचित् भेद पाया जाता है। 'एक्ककालेण' ऐसा कहनेपर एक कालोपयोगवर्गणाका ग्रहण करना चाहिए। इसलिए एक कषायके एक काम उदयस्थानमें और एक कषायोपयोगस्थानमें सदृशरूपसे उपयुक्त कौन-सी गति होती है ऐसा यहाँ पृच्छाका सम्बन्ध करना चाहिए। यहाँपर पूरे वाक्यका अर्थ यह है-क्रोधादि कषायोंमेंसे एक-एक कषायके असंख्यात लोकप्रमाण कषाय उदयस्थान और संख्यात आवलिप्रमाण कषाय उपयोगस्थान होते हैं। उनमें से एक कषायके एक कषाय उदयस्थानमें और कषायसम्बन्धी कालोपयोगस्थानमें एक समयमें उपयुक्त हुई कौन-सी गति होती है। क्या सब जीवोंका एक साथ उस प्रकारका परिणाम सम्भव है या नहीं है ऐसी पृच्छा की गई है। १२. 'विसरिसमुवजुज्जदे का च' ऐसा कहने पर दो कषाय उदयस्थानोंमें या तीन कषाय उदयस्थानोंमें इस विधिसे संख्यात या असंख्यात कषाय उदयस्थानोंमें एक समयमें
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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