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________________ मंगलाचरण उपयोग अर्थाधिकार कहने की सूचना प्रथम सूत्रगाथा और उसकी व्याख्या दूसरी तीसरी इसके अन्तर्गत दो प्रकारकी उपयोग वर्गणाओंका नामनिर्देश चौथी सूत्रगाथा और उसकी व्याख्या इसके अन्तर्गत दो प्रकारके उपदेशोंका निर्देश पाँचवीं सूत्रगाथा और उसकी व्याख्या छठी सातवीं "" "" "" 33 विषय-सूची उपयोग अर्थाधिकार 19 17 "1 चूर्णिसूत्रोंद्वारा उक्त सूत्र गाथाओंके व्याख्यानको सूचना प्रथम गाथाका विस्तृत विवेचन अद्धापरिमाण पदका अर्थ चारों कषायोंका जघन्य और उत्कृष्ट काल उक्त कालके विषयमें जीवस्थानसे चूर्णिसूत्रों का उल्लेखके आशय में अन्तरका उल्लेख गतियों में निष्क्रमण और प्रवेशकी अपेक्षा जघन्य काल एक समयका खुलासा ओघसे चारों कषायोंके कालके अल्पबहुत्वका निर्देश पृ.सं. १ उक्त ओघ प्ररूपणा के समान तिर्यञ्च और मनुष्यगति में जानने की सूचना १ २ नरकगतिमें उक्त प्ररूपणा ३ ६ प्रवाह्यमान उपदेशको अपेक्षा विशेष अधिक पदसे कितना काल लेना इसका खुलासा उक्त अल्पबहुत्वविषयक आदेशप्ररूपणा प्रवाह्यमान उपदेशकी अपेक्षा चारों गतियों में समुच्चयरूपसे कालविषयक अल्पबहुत्व - चौदह जीवसमासोंमें उक्त अल्पबहुत्व प्रत्येक कषायके उपयोगवारोंके क्रमका निर्देश उपयोगवार परिपाटियोंका संदृष्टि सहित विशेष खुलासा ६ ७ ७ १४ १४-४२ १४ १५ ९ १० ११ १५ १६ १७ १५ १९ १९ २३ २९ ३० देवगतिमें उक्त प्ररूपणा उक्त प्ररूपणाके अनुसार नरकगतिमें कषायों के परिवर्तनवारोंके अल्पबहुत्वका निर्देश देवगतिमें उक्त अल्पबहुत्व तिर्यञ्च मनुष्यगति में उक्त अल्पबहुत्व द्वितीय गाथाका विस्तृत विवेचन एक भवमें एक कषायके उपयोगोंकी संख्याके विचारका निर्देश नरकगति में उक्त प्ररूपणा शेष गतियोंमें उक्त प्रकारसे जाननेको सूचना नरकगतिमें किस कषायके कितने उपयोग होनेपर दूसरी कषायोंके कितने उपयोग होते हैं इसका स्पष्टीकरण नरकगति के समान देवगतिमें जानने की सूचना नरकगति में उक्त उपयोगविषयक अल्पबहुत्वका सकारण निर्देश नरकगति के समान देवगतिमें जाननेकी सूचना के साथ विशेषताका निर्देश तृतीय गाथाका विस्तृत विवेचन उक्त समग्र गाथाके पृच्छासूत्र होनेका निर्देश तथा स्पष्टीकरण उपयोगवर्गणाओंके दो भेदोंका निर्देश उपयोग वर्गणाका स्वरूप निर्देश कालोपयोगवर्गुणाका स्वरूप निर्देश भावोपयोगवर्गणाका स्वरूप निर्देश कालोपयोगवर्गणा और स्थान दोनों एक हैं भावोपयोगवर्गणा और कषायोदयस्थान दोनों एक हैं ८ ३८ ४० ४१ ४३-६० कषायोपयोगाद्धा पृ. सं. ३४ ३४ ३७ ४३ ४३ ४५ ४५ ४९ ५० ५९ ६०-६५ ६० ६१ ६१ ६२ ६२ ६२ ६२
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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