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________________ ३०६ जयधवलास हिदे कसायपाहुडे [ सम्मत्ताणियोगद्दारं १० य मणजोग - वचिजोग- कायजोगाणमण्णदरे जोगे वट्टमाणो दंसणमोहोत्रसामणाए पट्टवगो होइ । एवं णिट्ठवगो मज्झिमो य वत्तव्वो, तत्थ तदण्णदरणियमाणुवलद्धीदो । चदुण्हण्णदरमण जोगेण वा चदुण्हमण्णदखचिजोगेण वा, ओरालिय- वेउब्वियाणमदरायजोगेण वा, परिणदो संतो दंसणमोहोसामणमाढवेदि त्ति एसो एदस्स तावत्थो । $ १९७, संपहि तस्सेव लेस्सा मेदुप्पायणमुत्तरो सुन्तावयवो - ' जहण्णगो तेउलेस्साए ' । जइ वि सुट्टु मंदविसोहीए परिणमिय दंसणमोहणीयमुवसामेदुमाढवेइ तो वि तस्स तेउलेस्साए परिणामो चेव तप्पा ओग्गो होइ णो हेट्ठिमलेस्सापरिणामो तस्स सम्मत्तप्पत्तिकारणकरणपरिणामेहिं विरुद्धसरूवत्तादोति भणिदं होइ । एदेण तिरिक्ख-मणुस्सेसु किण्ह-णील- काउलेस्साणं सम्मत्तप्पत्तिकाले पडिसेहो कदो, विसोहिकाले अमुह - तिलेस्सापरिणामस्स संभवाणुववत्ती दो । देवेसु पुण जहारिहं सुहतिल्लेस्सापरिणामो चेव, [ण] तेण तत्थ वियहिचारो । रइएस वि अवट्ठिदकिण्हणील- काउलेस्सापरिणामेसु सुहतिलेस्साणमसंभवो चेवे त्ति ण तत्थेदं सुत्तं पयट्टदे । तदो तिरिक्ख-मणुसवियमेवेदं सुत्तमिदि गहेयव्वं । दरम् ।' मनोयोग, वचनयोग और काययोग इनमें से किसी एक योगमें वर्तमान जीव दर्शनमोहकी उपशमविधिका प्रस्थापक होता है । इसी प्रकार निष्ठापक और मध्यम. अवस्थावाले जीवके भी कहना चाहिए, क्योंकि इन दोनों अवस्थाओंमें प्रस्थापकसे भिन्न नियमकी उपलब्धि नहीं होती । चार प्रकारके मनोयोगोंमेंसे अन्यतर मनोयोगसे, चार प्रकारके वचनयोगों में से अन्यतर वचनयोगसे तथा औदारिक काययोग और वैक्रियिक काययोग इनमें से अन्यतर काययोगसे परिणत हुआ जीव दर्शनमोहकी उपशमविधिका आरम्भ करता है यह इसका भावार्थ है । $ १९७. अब उसीके लेश्याभेदका कथन करनेके लिये आगेका सूत्रवचन आया है'जहण्णगो तेउलेस्साए' यद्यपि अत्यन्त मन्द विशुद्धिसे परिणमकर दर्शनमोहकी उपशमन - विधिका प्रारम्भ करता है तो भी उसके तेजोलेश्याका परिणाम ही उसके योग्य होता है, उससे नीचेका लेश्यापरिणाम नहीं, क्योंकि वह सम्यक्त्वकी उत्पत्ति के कारणरूप करणपरिणामोंसे विरुद्ध स्वरूप है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इससे तिर्यच्चों और मनुष्यों में कृष्ण, नील और कापोत लेश्याओंका सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके समय प्रतिषेध कर दिया है, क्योंकि विशुद्धिके समय अशुभ तीन लेश्यारूप परिणाम सम्भव नहीं है । देवोंमें तो यथायोग्य शुभ तीन लेश्यारूप परिणाम ही होता है, इसलिए उक्त कथनका वहाँ पर कोई व्यभिचार नहीं आता । नारकियों में भी अवस्थितस्वरूप कृष्ण, नील और कापोतलेश्यापरिणाम होते हैं, वहाँ शुभ तीन श्यारूप परिणाम असम्भव ही हैं, इसलिए उनमें यह सूत्र प्रवृत्त नहीं होता । अतः तिर्यञ्चों और मनुष्योंको विषय करनेवाला ही यह सूत्र है ऐसा ग्रहण करना चाहिए । विशेषार्थ दर्शनमोहका उपशम करते समय इस जीवके प्रथम समय से लेकर
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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