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________________ २९७ गाथा ९५ ] दसणमोहोवसामणा $ १९२. एसा पढमगाहा दंसणमोहोवसामणपट्ठवणाए को सामिओ होइ किमविसेसेण चदुसु वि गदीसु वट्टमाणो, आहो अत्थि को विसेसो त्ति पुच्छाए णिण्णयविहाणट्ठमवइण्णा। एदिस्से किंचि अवयवत्थपरामसं कस्सामो। तं जहादंसणमोहस्स उवसामगो अविसेसेण चदुसु वि गदीसु होदि त्ति बोद्धव्वो। एवं चदुगदिविसयत्तसामण्णेणावहारिदस्स पाओग्गलद्धिमुहेण विसेसपदुप्पायणफलो गाहापच्छद्धणिद्देसो । तं कथं ? 'पंचिंदियसण्णी' इच्चादि । एत्थ पंचिंदियणिद्देसेण तिरिक्खगदीए एइंदियवियलिंदियाणं पडिसेहो कओ दट्ठव्यो । तत्थ वि सण्णिपंचिंदिओ चेव सम्मत्तुप्पत्तीए पाओग्गो होदि, णासण्णिपंचिंदिओ त्ति जाणावणट्ठ सण्णिविसेसणं कदं । एवं चदुगदिविसयत्तेण सण्णिपंचिंदियविसयत्तेण अवहारिदस्सेदस्स पजत्तावत्थाए चेव सम्मत्तुप्पत्तिपाओग्गभावो, णापजत्तावत्थाए त्ति जाणावणटुं "णियमा सो होइ पजत्तो' त्ति णिद्दिष्टुं । लद्धिअपज्जत्त-णिव्वत्तिअपज्जत्तए मोत्तूण णियमा णिव्वत्तिपज्जत्तो चेव सम्मत्तुप्पत्तिपाओग्गो होदि त्ति एसो एदस्स भावत्थो।। $ १९२. यह प्रथम गाथा दर्शनमोहनीयकर्मकी उपशामना प्रस्थापनाका कौन जीव स्वामी है, क्या अविशेषरूपसे चारों ही गतियोंमें विद्यमान जीव स्वामी है या कोई विशेषता है ऐसी पृच्छा होनेपर निर्णयका विधान करनेके लिये आई है । अब इसके पदोंके अर्थका कुछ परामर्श करेंगे। यथा-दर्शनमोहनीयकर्मका उपशम करनेवाला जीव सामान्यरूपसे चारों तियोंमें होता है ऐसा जानना चाहिए। इस प्रकार चारों गतियाँ दर्शनमोहनीय कर्मकी उपशमनाका विषय हैं इस बातका सामान्य रूपसे निश्चय होने पर प्रायोग्य लब्धिद्वारा विशेषका कथन करनेके लिये गाथाके उत्तरार्धका निर्देश है। शंका-वह कैसे ? समाधान-'पंचिंदियसण्णी' इत्यादि । इस पदमें 'पञ्चेन्द्रिय' पदके निर्देश द्वारा तिर्यञ्चगतिसम्बन्धी एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रियोंका प्रतिषेध किया हुआ जानना चाहिए। उसमें भी संज्ञो पञ्चेन्द्रिय जीव ही प्रथम सम्यक्त्वके योग्य होता है, असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीव नहीं इस बातका ज्ञान करानेके लिये उसका 'संज्ञी' विशेषण दिया है। इस प्रकार चारों गतियाँ इसका विषय है और संज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीव इसका विषय हैं इस रूपसे निश्चय किये गये इसके पर्याप्त अवस्थामें ही सम्यक्त्वकी उत्पत्तिकी योग्यता होती है, अपर्याप्त अवस्थामें नहीं इस बातका ज्ञान कराने के लिये 'णियमा सो होइ पज्जत्तो' इस वचनका निर्देश किया है। लब्ध्यपर्याप्त और नित्यपर्याप्त अवस्थाको छोड़कर नियमसे निवृत्ति पर्याप्त जीव ही प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके योग्य होता है यह इसका भावार्थ है। विशेषार्थ-यहाँ पर प्रथम सम्यक्त्वको ग्रहण करनेके लिये कौन जीव योग्य होता है इसका निर्देश किया गया है । जो जीव प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेके सन्मुख होता है वह चारों गतियोंका होकर भी संज्ञी, पञ्चेन्द्रिय, पर्याप्त होना चाहिए। इसका यह तात्पर्य है कि यदि वह नारकी या देवगतिका जीव है तो उसके संजी पञ्चेन्द्रिय होनेपर भी नित्यपर्याप्त ३/
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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