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________________ माथा ९४] दसणमोहोवसामणा २२३ बंधवोच्छेदो । तदो सागरोवमपुधत्तमोसरियूण सुहुम-पज्जत्त-पत्तेयसरीर० परोप्परसंजुत्ताणं बंधवोच्छेदो । तदो सागरोवमपुधत्तं ओसरियूण बादर-पज्जत्त-साहारणसरीराणं परोप्परसंजोगविसेसिद० बंधवोच्छेदो। तदो सागरोवमपुधत्तं ओसरिदूण बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीरएइंदिय-आदाव-थावरणामाणं छण्हं पयडीणमेकदो बंधवोच्छेदो । तदो सागरोवमपुधत्तं ओसरियण बीइंदिय०-पज्जत्ताणं बंधवोच्छेदो । तदो सागरोवमपुधत्तं ओसरियण तीइंदिय-पज्जत्ताणं बंधवोच्छेदो। तदो सागरोवमपुधत्तं ओसरियण चउरिदिय०-पज्जत्तबंधवोच्छेदो । तदो सागरोवमपुधत्तं ओसरिदूण असण्णिपंचिंदिय०-पन्ज० बंधवोच्छेदो । तदो' सागरोवमपुधत्तं ओसरिदूण तिरिक्खगइ-तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुव्वी-उज्जोवसण्णिदाणं तिण्हं पयडीणमेक्कदो बंधवोच्छेदो । तदो सागरोवपुधत्तं ओसरिदूण णीचागोदस्स बंधवोच्छेदो। णवरि सत्तमपुढिविणेरइयमस्सियूण तिरिक्खगइ-तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुवी-उज्जोव-णीचागोदाणं बंधवोच्छेदो पत्थि । अदो चेव सुत्ते तेसिं बंधवोच्छेदो अणुवइट्ठो। तदो सागरोवमपुधत्तं ओसरियूण अप्पसत्थविहायगइ-दूभग-दुस्सर-अणा सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर० परस्पर संयुक्त सूक्ष्म, पर्याप्त और साधारणशरीर नामकर्मकी एक साथ बन्धव्युच्छित्ति होती है । उससे आगे सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर० परस्पर संयुक्त सूक्ष्म, पर्याप्त और प्रत्येक शरीर नामकर्मकी एक साथ बन्धव्युच्छित्ति होती है। उससे आगे सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर० परस्पर संयुक्त बादर, पर्याप्त और साधारण शरीर नामकर्मकी बन्धव्युच्छित्ति होती है। उससे आगे सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर० बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, एकेन्द्रियजाति, आतप और स्थावर नामकर्म इन छह प्रकृतियोंकी एक साथ बन्धव्युच्छित्ति होती है। उससे आगे सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर बन्ध करनेवाले जीवके द्वीन्द्रियजाति और पर्याप्त नामकर्मकी बन्धव्युच्छित्ति होती है। उससे आगे सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर बन्ध करनेवाले जीवके त्रीन्द्रियजाति और पर्याप्त नामकर्मकी बन्धव्यच्छित्ति होती है। उससे आगे सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर बन्ध करनेवाले जीवके चतुरिन्द्रियजाति और पर्याप्त नामकर्मकी बन्धव्युच्छित्ति होती है। उससे आगे सागरोपम पृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर बन्ध करनेवाले जीवके असंज्ञी पञ्चेन्द्रियजाति और पर्याप्त नामकर्मकी बन्धव्युच्छित्ति होती है । उससे आगे सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर बन्ध करनेवाले जीवके तिर्यश्चगति, तिर्यश्वगत्यानुपूर्वी और उद्योत इन तीन प्रकृतियोंकी एक साथ बन्धव्युच्छित्ति होती है। उससे आगे सागरोपमप्रथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर बन्ध करवेवाले जीवके नीचगोत्रकी बन्धव्युच्छित्ति होती है । इतनी विशेषता है कि सातवीं पृथिवीके नारकीके तिर्यञ्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, उद्योत और नीचगोत्रकी बन्धव्युच्छित्ति नहीं होती और इसीलिये सूत्र में इनकी बन्धव्युच्छित्तिका निर्देश नहीं किया। उससे आगे सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर बन्ध करनेवाले जीवके अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुःस्वर, और अनादेय इन प्रकृतियोंकी एक साथ बन्धव्युच्छित्ति होती है। उससे आगे सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण स्थिति घटाकर १. ता०प्रती बंधवोच्छेदो । [तदो सागरो० पुधत्त. ओसरि० सण्णिपज्ज. बंध.] तदो इति पाठः।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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