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________________ ११० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ तव्वियप्पुप्पत्तिदंसणादो। एवमेदाणि दुविहाणि वि द्वाणाणि उवजोगसंबंधित्तादो उवजोगवग्गणाओ त्ति एत्थ विवक्खियाणि । संपहि एदस्सेवत्थस्स णिग्गमणमुवरिमं सुत्तमाह * एदाणि दुविहाणि वि हाणाणि उवजोगवग्गणाओ त्ति वुचंति । ६२४३. सुगममेदं । तत्थ ताव उवजोगद्धट्ठाणेसु जीवहिं विरहिदाविरहिदहाणपरूवणमुवरिमो सुत्तपबंधो * उवजोगद्धट्ठाणेहिं ताव केत्तिएहिं विरहिवं केहिं कम्हि अविरहिदं? $ २४४. केत्तिएहिं उवजोगद्धट्ठाणेहिं णिरंतरसरूवेण गदेहिं जीवविरहिदं ठाणमुवलब्भइ, केहिं वा जीवेहिं कम्हि गदिविसेसे अविरहियमसुण्णं होदूण कं ठाणमुवलब्भदि त्ति एत्थ पदसंबंधो कायव्यो । एवं पुच्छाणिद्देसं कादूण तदो एसा मग्गणा एत्थ कायव्या त्ति पदुप्पायणट्ठमिदमाह * एत्थ मग्गणा। $ २४५. एदम्मि अत्थविसेसे एसा मग्गणा णिरयादिगदीओ अस्सियूण कायव्वा त्ति भणिदं होइ । तत्थ ताव णिरयगदीए पयदमग्गणद्वमुवरिमपबंधमाह घटाकर जो शेष रहे उसमें एक अंकके मिला देनेपर उनके भेदोंकी उत्पत्ति देखी जाती है। इस प्रकार ये दोनों ही स्थान उपयोगसम्बन्धी होनेसे उपयोगवर्गणाएँ हैं ऐसा यहाँ विवक्षित किया गया है । अब इसी अर्थका विशेष ज्ञान करानेके लिए आगेके सूत्रको कहते हैं * ये दोनों ही प्रकारके स्थान उपयोगवर्गणा इस नामसे कहे जाते हैं। $ २४३. यह सूत्र सुगम है। सर्वप्रथम उनमेंसे उपयोग-अद्धास्थानोंमें जीवोंसे रहित और सहित स्थानोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्रप्रबन्ध आया है * कितने उपयोग-अद्धास्थानोंके जानेके बाद कौन स्थान रहित पाया जाता है और किन जीवोंसे किस गतिविशेषमें कौन स्थान सहित पाया जाता है। ____$२४४. कितने उपयोग-अद्धास्थानोंके द्वारा निरन्तररूपसे जानेके बाद कौन स्थान जीवोंसे रहित उपलब्ध होता है और किन जीवोंसे किस गतिविशेषमें कौन स्थान सहित अर्थात् अशून्य उपलब्ध होता है इस प्रकार यहाँपर पदसम्बन्ध करना चाहिए। इस प्रकार पृच्छानिर्देश करके उसके बाद यह मार्गणा यहाँपर करनी चाहिए इस बातका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * अब प्रकृतमें उक्त विषयकी मार्गणा करते हैं। $ २४५. इस अर्थविशेषको ध्यानमें रखकर नरकादि गतियोंके आश्रयसे यह मार्गणा करनी चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है। उसमें सर्वप्रथम नरकगतिमें प्रकृत मार्गणाके लिए आगेके प्रवन्धको कहते हैं १. ता०प्रती उवजोगवग्गणाणि इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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