SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 113
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ जयधवलास हिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ जहणोवजोगकालप्पहु डि जावुक्कस्सोवजोगकालो ति णिरंतरमवट्टिदाणं वियप्पाणं कालोवजोगवरंगणा त्ति सण्णा, कालविसयाओ उवजोगवग्गणाओ कालोवजोगवग्गणाओ त्ति गहणादो । भावदो तिव्वमंदादिभावपरिणदाणं कसायुदयद्वाणाणं विपपहुड जावुक्कस्सवियप्पो त्ति छवड्डिकमेणावट्ठियाणं भावोवजोगवग्गणा त्ति वसो, भावविसेसिदाओ उवजोगवग्गणाओ भावोवजोगवग्गणाओ त्ति विवक्खियत्तादो | एवंविहाओ दुविहाओ उवजोगवग्गणाओ एत्थाहिकयाओ त्ति एसो एदस्स सुत्तस्स भावत्थो । संपहि काओ ताओ कालोवजोगवग्गणाओ काओ वा भावोवजोगवग्गणाओ त्ति विसेसियूण परूवणडमुवरिमसुत्तद्द यमोइणं ६२ * कालोवजोगवग्गणाओ णाम कसायोवजोगद्धट्ठाणाणि । $ १२८. कसायाणमुवजोगो तस्स अद्धा कालपरिच्छित्ती कसायोवजोगद्धा | तिस्से द्वाणाणि जहण्णुकस्सादिवियप्पा कालोवजोगवग्गणाओ णाम । कोहादिकसायोवजोगजहण्णकालमुकस्सकालादो सोहिय सुद्धसेसम्मि एगरूवे पक्खित्ते कसायोवजोगद्धट्ठाण होंति । तेसिं कालोवजोगवग्गणाववएसो ति सुत्तत्थसंगहो । * भावोवजोगवग्गणाओ णाम कसायोदयद्वाणाणि । $ १२९. कसायाणमुदयद्वाणाणि कसायोदयट्ठाणाणि । ताणि भावोवजोगवग्गणाओ । एतदुक्तं भवति — कोहादिकसायाणमेकेकस्स कसायस्स असंखेज्जलोग अपेक्षा और भावकी अपेक्षा । उनमेंसे कालकी अपेक्षा जघन्य उपयोगकालसे लेकर उत्कृष्ट उपयोगकाल तक निरन्तर अवस्थित हुए विकल्पोंकी कालोपयोगवर्गणा संज्ञा है, क्योंकि कालविषयक उपयोगवर्गणाऐं कालोपयोगवर्गणाऐं हैं ऐसा यहाँ ग्रहण किया गया है । भावकी अपेक्षा तीव्र और मन्द आदि भावोंसे परिणत हुए तथा जघन्य विकल्पसे लेकर उत्कृष्ट विकल्प तक छह वृद्धिक्रमसे अवस्थित हुए कषाय- उदयस्थानोंकी भावोपयोगवर्गणा संज्ञा है, क्योंकि भावविशिष्ट उपयोगवर्गणाऐं भावोपयोगवर्गणाऐं कहलाती हैं ऐसी यहाँ विवक्षा की गई है। इस प्रकार दो प्रकारकी उपयोगवर्गणाऐं यहाँपर अधिकृत हैं यह इस सूत्रका भावार्थ है। अब वे कालोपयोगवर्गगाऐं क्या हैं और भावोपयोगवर्गणाऐं क्या हैं इस प्रकार विशेषरूप से कथन करनेके लिए आगे दो सूत्र आये हैं- * कषायके उपयोगसम्बन्धी अद्धास्थानोंकी कालोपयोगवर्गणा संज्ञा है । 1 $ १२८. जो कषायों का उपयोग है उसकी 'अद्धा' अर्थात् कालमर्यादा वह कषायोपयोगाद्धा है । उसके जघन्य और उत्कृष्ट आदि भेदरूप स्थानोंको कालोपयोगवर्गणा कहते हैं । क्रोधादिकषायोंके उपयोगसम्बन्धी जघन्य कालको उत्कृष्ट कालमें से घटानेपर जो शेष रहे उसमें एक अंक मिलानेपर कषायसम्बन्धी उपयोग अद्धास्थान होते हैं। उनकी कालोपयोगवर्गणा संज्ञा है यह इस सूत्रका समुच्चयरूप अर्थ है । * कषायोंके उदयस्थानोंकी भावोपयोगवर्गणा संज्ञा है । $ १२९. कषायोंके उदयस्थान कषायोदयस्थान कहलाते हैं । उनकी भावोपयोगवर्गणा संज्ञा है । इसका यह तात्पर्य है -- क्रोधादि कषायोंमेंसे एक-एक कषायके असंख्यात लोक
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy