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________________ गाथा ६४ ] विदियगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा त्ति गहेयव्वा । कोहस्स असंखेजोवजोगिगा भवा पुव्वमेव पारभंति, तदो माणस्स, तदो मायाए, सव्वपच्छा लोभस्स असंखेज्जोवजो गिगा भवा पारभंति । एकादो हेडिमसव्वसुण्णट्ठाणाणि संखेोवजोगिगभवा त्ति गेहियव्वा । कोहस्स संखेजोवजोगिगा भवा पुव्यमेव समप्पंति, तदो पच्छा माण - माया - लोहाणं संखेज्जोवजोगिगभवा अप्पप्पण्णो पाओग्गमद्वाणं गंतूण जहाकमं समप्पंति त्ति घेत्तव्वं । एवमेत्तिएण पबंधेण उवसंदरिसणाकरणं समाणिय संपहि एदम्हादो साहणादो पयदप्पा बहुअपरूवणमुवरिमं पबंधमाह ५५ * एदेण कारणेण जे असंखेज्जलो भोवजोगिगा भवा ते भवा थोवा । $ ११२. जेण कारणेण सव्वपच्छा एदेसिं पारंभो तेणेदे सव्वत्थोवा त्ति भणिदं होइ । तेसिं पमाणं केत्तियं ? एगवस्सन्भंतरलोभोवजोगेहिं जहण्णपरित्तासंखे भागे हिदे तत्थ भागलद्धसंखेज्जरूवमेत्त वस्सेहिं परिहीणते त्तीसं सागरोवमपमाणा होतॄण पुणो अदीदकालप्पणाएं अनंता त्ति घेत्तव्वा पादेकमणंतवारमेदेसु भववियप्पेस एगजीवस्स समुप्पत्तिदंसणादो । तदो एदे सव्वे संभूय अनंत संखावच्छिण्णा होदूण सव्वत्थोवा ि भवोंको सूचित करते हैं ऐसा प्रहण करना चाहिए । क्रोधकषायके असंख्यात उपयोगवाले भव पहले ही प्रारम्भ हो जाते हैं । तदनन्तर मानकषायके, उनके बाद मायाकषाय के और सबके बाद लोभकषायके असंख्यात उपयोगवाले भव प्रारम्भ होते हैं। एक अंकसे पूर्व के सब शून्यस्थान संख्यात उपयोगवाले भवोंके सूचक है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। क्रोधकषायके संख्यात उपयोगवाले भव पहले ही समाप्त हो जाते हैं। उसके वाद मान, माया और लोभकषायके संख्यात उपयोगवाले भव अपने-अपने योग्य स्थान तक जाकर क्रमसे समाप्त होते हैं ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए । इस प्रकार इतने प्रबन्धके द्वारा उपसंदर्शनाकरणको समाप्त कर अब इस साधनके अनुसार प्रकृत अल्पबहुत्वका कथन करनेके लिए आगेके प्रबन्धको कहते हैं * इस कारणसे लोभकषायके जो असंख्यात - उपयोगवाले भव हैं वे सबसे थोड़े हैं । $ ११२. जिस कारण से लोभकषायके असंख्यात उपयोगवाले भवोंका सबके बाद प्रारम्भ होता है, इसलिए ये सबसे थोड़े हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । शंका — उनका प्रमाण कितना है ? - एक वर्षके भीतर प्राप्त हुए लोभकषायके उपयोगोंके द्वारा जघन्य परीतासमाधानसंख्यातके भाजित करने पर वहाँ लब्ध हुए एक भागप्रमाण जो संख्यात वर्ष उनसे हीन तेतीस सागरोपममाण होकर पुनः अतीत कालकी मुख्यतासे वे अनन्त हैं ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि पृथक्-पृथक् अनन्तवार भेदवाले भवविकल्पोंमें एक जीवकी उत्पत्ति देखी जाती है । १. ता० प्रतौ० उबरिमसव्वसुण्णद्वाणाणि असंखेज्जोवजोगिगा भवा एदाणि दसवस्ससहस्साणि तदो समयुत्तरादिकमेण गेण्हियव्वं जाव तेसि सागरोवमाणि त्ति पुव्वमेव इति पाठः । २. ता० आ० प्रत्योः पण्णाए इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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