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________________ गा० ६२ ] उत्तरपयंडिअणुभागउदीरणाए एयजीवेण अंतरं $ १९५. सुगमं । * जहरणेण अंतोमुहुत्त । * उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियह देसूणं । ७७ $ १९६. दाणि दो वि सुत्ताणि सुगमाणि । संपहि सुत्तसूचिदत्य विसये णिण्णयजणणमुच्चारणाणुगमं कस्सामा । तं जहा $ १९७, अंतरं दुविहं - जह० उक्क० । उक्कस्से पयदं । दुविहो णि० - ओघेण आदेसेण य । ओघेण मिच्छ० - अनंताणु - ४ उक्क० अणुभागुदी ० जह० एयस०, उक्क० अणंतकालमसंखेज्जा पोग्गलपरियट्टा । अणुक्क० जह० एयस०, उक्क० वेछावट्टिसागरो ० सादिरेयाणि । एवमकसाय० । णवरि अणुक्क० जह० एस ०, उक्क० पुव्वकोडी देसूणा । एवं चदुसंजलण-भय-दुगुंछ० । णवरि अणुक्क० जह० एगस०, उक्क० अंतोमु॰ । एवं हस्स-रदि० । णवरि अणुक्क० जह० एयस०, उक्क० तेत्तीसं सागरो ० सादिरेयाणि । एवमरदि-सोग० । णवरि अणुक्क० जह० एगस०, उक्क० छम्मासा | एवं स० । वरि अणुक्क० जह० एगस०, उक्क सागरोवमसदपुत्तं । इत्विवेद $ १९५. यह सूत्र सुगम है * जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है । * उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है । $ १९६. ये दोनों ही सूत्र सुगम हैं । अब चूर्णिसूत्र के द्वारा सूचित हुए अर्थके विषवमें निर्णय उत्पन्न करनेके लिए उच्चारणाका अनुगम करेंगे । यथा $ १९७. अन्तरकाल दो प्रकारका है— जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है - ओघ और आदेश । ओघसे मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्कके उत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल अनन्तकाल है जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन के बराबर है । अनुत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक दो छ्यासठ सागरोपम है । इसी प्रकार आठ कषायों की अपेक्षा जान लेना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनके अनुत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम एक पूर्वकोटिप्रमाण है । इसी प्रकार चार संज्वलन, भय और जुगुप्साकी अपेक्षा जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनके अनुत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है । इसी प्रकार हास्य और रतिकी अपेक्षा जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनके अनुत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक तेतीस सागरोपम है । इसी प्रकार अरति और शोककी अपेक्षा जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनके अनुत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल छह महीनाप्रमाण है । इसी प्रकार नपुंसकवेदकीं अपेक्षा जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इसके अनुत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल सौ सागर पृथक्त्वप्रमाण है । स्त्रीवेद और
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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