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________________ ७० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ वेदगो ७ अणुक्क० जह० अंतोसु० । इत्थिवेद० अणुक० जह० एगसमओ, उक्क० तिण्णि पलिदोवमाणि पलिदो० सादिरे० पलिदो० सादिरे० । सोहम्मोसाण० इत्थिवेद० देवोघं । उवरि इत्थिवेदो णत्थि । सहस्सारे हस्स-रदी० ओघं ।। $ १७७. अणुदिसादि० सव्वट्ठा त्ति सम्म०-पुरिसवे० उक्क० अणुभागुदी० जह० एगस०, उक्क० वे समया। अणुक० जह० एगस०, उक० सगट्टिदी। बारसक०छण्णोक० उक्क० जह० एगस०, उक्क० बे समया । अणुक्क० जह० एगस०, उक्क० अंतोमु० । एवं जाव०। * एत्तो जहएणगो कालो। $ १७८. अहियारसंभालणवक्कमेदं । * सव्वासि पयडीणं जहण्णाणुभागउदीरगो केवचिरं कालादो होदि ? १७९. सुगम् । * जहणणुकस्सेण एगसमओ । $ १८०. तं जहा–मिच्छत्तस्स सम्मत्तविसुद्धसंजमाहिमुहचरिमसमयमिच्छाइद्विम्मि जहण्णसामित्तं जादं । एवं सम्मामिच्छादीणं पि णेदव्वं । तदो चरिमविसोहीए पडिलद्धजहण्णसामित्ताणमेदेसिं जहण्णाणुभागुदीरणकालो जहण्णुकस्सेणेगसमयमेत्तो चेवे त्ति काल अन्तर्मुहूर्त है । स्त्रीवेदके अनुत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल क्रमसे तीन पल्योपम, साधिक एक पल्योपम और साधिक एक पल्योपम है। सौधर्म और ऐशान कल्पमें स्त्रीवेदका भंग सामान्य देवोंके समान है। आगेके देवोंमें स्त्रीवेद नहीं है । सहस्रारकल्पमें हास्य और रतिका भंग सामान्य देवोंके समान है। $ १७७. अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवोंमें सम्यक्त्व और पुरुषवेदके उत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल दो समय है। अनुत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अपनी-अपनी स्थितिप्रमाण है। बारह कषाय और छह नोकपायोंके उत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल दो समय है । अनुत्कृष्ट अनुभागके उदीरकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए। * इससे आगे जघन्य कालका अधिकार है । $ १७८. अधिकारकी सम्हाल करनेवाला यह सूत्रवचन है। * सब प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागके उदीरकका कितना काल है ? $ १७९. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । ६ १८०. यथा-सम्यक्त्वविशुद्ध संयमके अभिमुख अन्तिम समयवर्ती मिथ्यादृष्टिके मिथ्यात्वका जघन्य स्वामित्व है। इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्व आदिका भी जानना चाहिए । इसलिए अन्तिम विशुद्धिसे जिन्होंने जघन्य स्वामित्व प्राप्त किया है ऐसी इन कृतियोंके जघन्य अनुभागकी उदीरणाका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समयमात्र ही होता है यह सिद्ध हुआ।
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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