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________________ गा० ६२] उत्तरपयडिपदेसउदीरणाए अप्पाबहुअं $ २९६. कुदो ? सामत्तिभेदाभावे वि पयडिविसेसेण पुग्विन्लादो संपहियदव्वस्स विसेसाहियत्तदंसणादो। एत्थ भयदुगछाणमण्णदरस्स जहण्णभावे इच्छिजमाणे दोण्हं पि उदयं कादूण गेण्हियव्वं, अण्णहा जहण्णभावाणुववत्तीदो। * हस्स-सोगाणं जहणिया पद सुदीरणा विसेसाहिया। $ २९७. कुदो ? पयडिविसेसादो।। * रदि-अरदीणं जहणिया पदेस दीरणा विसेसाहिया। 5२९८. कुदो ? पयडिविसेसादो । एदासि पयडीणं जहण्णभावे इच्छिज्जमाणे भय-दुगछाणमुदयं कादूण गेण्हियव्वं, अण्णहा तत्थ थिवुक्कसंकमेण सह पयददव्वस्स बहुत्तप्पसंगादो। * तिण्हं वेदाणं जहणिया पद सुदीरणा अण्णदरा विसेसाहिया । 5 २९९. कुदो ? पयडिविसेसादो। * संजलणाणं जहणिया पंदस दीरणा अण्णदरा संखजगुणा । $३००. को गुणगारो ? सादिरेयपंचरूवमेत्तो, णोकसायभागस्स पंचमभागमेत्तवेदुदीरणादव्वादो संपुण्णकसायभागमेत्तसंजलणोदीरणदव्वस्स पयडिविसेसगब्भस्स तावदिगुणत्तसिद्धीए णिव्वाहमुवलंभादो । एवमोघजहण्णओ समत्तो । $ २९६. क्योंकि स्वामित्व भेदका अभाव होनेपर भी प्रकृतिविशेषके कारण ही पहलेके द्रव्यसे साम्प्रतिक द्रब्य विशेष अधिक देखा जाता है। यहाँ पर भय और जुगुप्सामेंसे अन्यतर का जघन्यपना इच्छित होने पर दोनोंका ही उदय करके ग्रहण करना चाहिए, अन्यथा जघन्यपना नहीं बन सकता। * उससे हास्य और शोककी जघन्य प्रदेश उदीरणा विशेष अधिक है। $ २९७. क्योंकि प्रकृतिविशेष इसका कारण है।। उससे रति और अरतिकी जघन्य प्रदेश उदीरणा विशेष अधिक है। ६ २९८. क्योंकि इसका कारण प्रकृतिविशेष है। इन प्रकृतियोंका जघन्यपना इच्छित होनेपर भय और जुगुप्साका उदय करके ग्रहण करना चाहिए, अन्यथा वहाँ स्तिवुकसंक्रमके द्वारा प्राप्त द्रव्यके साथ प्रकृत द्रव्यको बहुत्वका प्रसंग आ जायगा। * उससे तीनों वेदोंमेंसे अन्यतर वेदकी जघन्य प्रदेश उदीरणा विशेष अधिक है। $ २९९. क्यों कि इसका कारण प्रकृतिविशेष है। * उससे संज्वलन कषायोंमेंसे अन्यतर प्रकृतिकी जघन्य प्रदेश उदीरणा संख्यातगुणी है। ३००. गुणकार क्या है ? साधिक पाँच अंकप्रमाण गुणकार है। नोकषायके भागके पाँचवें भागमात्र वेदका उदीरणाद्रव्य है, उससे सम्पूर्ण कषायके भागमात्र प्रकृतिविशेषगर्भ संज्वलन कषायके द्रव्यके उतने गुणेको सिद्धि निर्बाधरूपसे उपलब्ध होती है। इस प्रकार ओघसे जघन्य अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। १. आ प्रतौ तत्येवुक्कस्ससंकमेण ता प्रतौ यिवुक्कस्ससंकमेण इति पाठः ।
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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