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________________ गा० ६२ ] उत्तरपयडिपदेसउदीरणाए एयजीवेण कालो २२३ $१०८. जहा मिच्छत्तस्स जहण्णपदेसुदीरणासामित्तं कदं तहा एदेसि पि कम्माणं कायव्वं, विसेसाभावादो। एवमोघो समत्तो। १०९. संपहि आदेसपरूवणद्वमुच्चारणाणुगममिह कस्सामो । तं जहा-जहण्णए पयदं । दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण मिच्छ०-सोलसक०-णवणोक० जह० पदेसुदी० कस्स ? अण्णद० मिच्छाइद्विस्स उक्कस्ससंकिलिट्ठस्स तप्पाओग्गसंकिलिट्ठस्स या । सम्मामि० जह० पदेसुदी० कस्स ? अण्णद० मिच्छत्ताहिमुहस्स तप्पा ओग्गसंकिलिट्ठस्स चरिमसमयसम्मामिच्छाइट्ठिस्स । एवं सम्मत्तस्स । णवरि चरिमसमयसम्माइद्विस्स । सव्वणिरय-तिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खतिय-मणुसतिय-देवा जाव सहस्सारे त्ति जाओ पयडीओ उदीरिजंति तासिमोघं । पंचिंदियतिरिक्खअपज्ज०-मणुसअपज०-अणुदिसादि सव्वट्ठा ति सव्वपयडी. जह० पदेसुदी० कस्स ? अण्णद० तप्पाओग्गसंकिलिट्ठस्स । आणदादि जाव गवगेवजा त्ति सणकुमारभंगो । एवं जाव । * एयजीवेण कालो। $ ११०. सुगममेदमहियारसंभालणसुत्तं । ६१०८. जिस प्रकार मिथ्यात्वकी जघन्य प्रदेश उदीरणाका स्वामित्व किया है उसी प्रकार इन कर्मोकी भी जघन्य प्रदेश उदीरणका स्वामित्व करना चाहिए, उससे इसमें कोई विशेषता नहीं है। ____ इस प्रकार ओघ स्वामित्व समाप्त हुआ। .६ १०९. अब आदेशका कथन करनेके लिए उच्चारणाका अनुगम यहाँ पर करेंगे। यथा-जघन्यका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नौ नोकषायोंकी जघन्य प्रदेश उदीरणा किसके होती है ? उत्कृष्ट संक्लेश परिणामवाले या तत्प्रायोग्य संक्लेश परिणामवाले अन्यतर मिथ्यादृष्टिके होती है। सम्यग्मिथ्यात्वकी जघन्य प्रदेश उदीरणा किसके होती है ? मिथ्यात्वके अभिमुख हुए तत्प्रायोग्य संक्लेश परिणामवाले अन्तिम समयवर्ती अन्यतर सम्यग्मिथ्यादृष्टिके होती है। इसी सम्यक्त्वकी जघन्य प्रदेश उदीरणाका स्वामित्व जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि अन्तिम समयवर्ती सम्यग्दृष्टिके कहना चाहिए। सब नारकी, सामान्य तिर्यश्च, पञ्चन्द्रिय तिर्यचत्रिक, मनुष्यत्रिक और सामान्य देवोंसे लेकर सहस्रार कल्प तकके देवोंमें जिन प्रकृतियोंकी उदीरणा होती है उनका भंग ओघके समान है। पञ्चेन्द्रिय तियश्च अपर्याप्त, मनुष्य अपर्याप्त और अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवोंमें सब प्रकृतियोंकी जघन्य प्रदेश उदीरणा किसके होती है ? अन्यतर तत्प्रायोग्य संक्लेश परिणामवालेके होती है। आनत कल्पसे लेकर नौ अवेयक तकके देवोंमें सनत्कुमार कल्पके समान भंग है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए। * एक जीवकी अपेक्षा कालका अधिकार है। $ ११०. अधिकारको सम्हाल करनेवाला यह सूत्र सुगम है।
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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