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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ वेदगो ७ वयवभूदं जमत्थपदं तमवलंवगं कादणाणुभागउदीरणा इदाणि विहासियव्वा त्ति भणिदं होइ । संपहि अणुभागुदीरणाए सरूवविसेसजाणावणट्ठमट्ठपदं परूवेमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ * तत्थ अट्ठपदं। २. तत्थाणुभागुदीरणावसरे अट्ठपदं ताव कस्सामो। किमट्टपदं णाम ? जत्तो सोदाराणं पयदत्थविसए सम्ममवगमो समुप्पज्जइ तमट्ठस्स वाचयं पदमट्ठपदमिदि भण्णदे। * तं जहा। * अणुभागा पयोगेण ओकड्डियूण उदये दिज्जति सा उदीरणा। $ ३. एदस्स सुत्तस्स अत्थो वुच्चदे—अणुभागा मूलुत्तरपयडीणमणंतभेयभिण्णफद्दयवग्गणाविभागपलिच्छेदसरूवा पयोगेण परिणामविसेसेण ओकट्टियूण अणंतगुणहीणसरूवेण जमुदए दिज्जति सा उदीरणा णाम | कुदो ? 'अपक्वपाचनमुदीरणे त्ति' वचनात् । तदो अणुभागुदीरणा ओकड्डणाविणाभाविणि त्ति कट्ट ओकड्डणाविसयमेत्थ किंचि अत्थपदं परूवेमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ दूसरा अवयवभूत अर्थपद है। उसका अवलम्बन कर इस समय अनुभाग उदीरणाका व्याख्यान करना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अब अनुभाग उदीरणा के स्वरूप विशेषका ज्ञान करानेके लिए अर्थपद की प्ररूपणा करते हुए आगेके सूत्र प्रबन्धको कहते हैं * उस विषयमें यह अर्थपद है। $ २. वहाँ अनुभाग उदीरणाके अवसर पर सर्वप्रथम अर्थपदका कथन करते हैं। शंका-अर्थपद किसे कहते हैं ? समाधान--जिससे श्रोताओंको प्रकृत अर्थके विषयमें सम्यक् ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थके वाचक उस पदको अर्थपद कहते हैं। * यथा* प्रयोगवश अनुभाग अपकर्षित कर उदयमें दिये जाते हैं वह उदीरणा है। ३. अब इस सूत्रका अर्थ कहते हैं-मूल और उत्तर प्रकृतियोंके अनन्त भेदोंको प्राप्त स्पर्धक, वर्गणा और अविभागप्रतिच्छेदस्वरूप अनुभाग प्रयोग वश अर्थात् परिणाम विशेषके कारण अपकर्षित कर अनन्तगुण हीनरूपसे जो उदयमें दिये जाते हैं उसकी उदीरणा संज्ञा है, क्योंकि अपक्वपाचनको उदीरणा कहते हैं ऐसा आगमवचन है । इसलिए अनुभाग उदीरणा अपकर्षणकी अविनाभाविनी है 'ऐसा समझकर यहाँ अपकर्षणाविषयक थोड़ेसे अर्थपदका प्ररूपण करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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