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________________ १०४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ वेदगो ७ एयस०, उक्क० असंखे० लोगा । अजह ० णत्थि अंतरं । एवं पंचिदियतिरिक्खतिए raft वेदा जाणिव्वा । जोणिणीसु सम्म० कसायभंगो । २५४. पंचि०तिरिक्खअपज्ज० सव्वपय० जह० जह० एगस०, उक्क० असंखेजा लोगा । अजह० णत्थि अंतरं । एवं मणुसअपज० । णवरि अजह० जह० एस ०, उक्क षलिदो ० असं० भागो । $ २५५. देवेसु दंसणतिय - अनंताणु०४ णारयभंगो । सेसपयडी ० जह० जह० एयस०, उक्क० असंखेज्जा लोगा । अजह० णत्थि अंतरं । एवं सोहम्मीसाण० । एवं सणक्कुमारादि णवगेवजा त्ति । णवरि इत्थवे ० णत्थि । भवण ० - वाणवें - जोदिसि ० देवोघं । वरि सम्म० कसायभंगो । $ २५६. अणुद्दिसादि सव्वट्ठा त्ति सम्म० जह० जह० एगस०, उक्क० वास प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागके उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण है । अजघन्य अनुभागके उदीरकोंका अन्तरकाल नहीं है । इसी प्रकार पचेन्द्रिय तिर्यञ्चत्रिक में जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि अपना-अपना वेद जान लेना चाहिए । योनिनी तिर्यों में सम्यक्त्वका भंग कषायोंके समान है । विशेषार्थ — यद्यपि तिर्यञ्चों में मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी जघन्य अनुभाग उदीरणाका स्वामित्व संयमासंयमके अभिमुख हुए सर्वविशुद्ध मिध्यादृष्टि संज्ञी पश्चेन्द्रियके मिथ्यात्वके अन्तिम समयमें होता है तथापि ऐसी विशुद्धिवाला उक्त जीव कमसे कम एक समयके अन्तरसे हो यह भी सम्भव है और अधिक से अधिक असंख्यात लोकप्रमाण कालके अन्तरसे हो यह भी सम्भव है । इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर यहाँ इन प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागके उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण कहा है। शेष कथन सुगम है । $ २५४. पचेन्द्रिय तिर्यश्व अपर्याप्तकों में सब प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागके उदीरकों का जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण है । अजघन्य अनुभागके उदीरकोंका अन्तरकाल नहीं है। इसी प्रकार मनुष्य अपर्याप्तकों में जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनके अजघन्य अनुभागके उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण है । $ २५५. देवों में दर्शनमोहनीय तीन और अनन्तानुबन्धी चारका भंग नारकियोंके समान है। शेष प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागके उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है। और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण है अजघन्य अनुभागके उदीरकोंका अन्तरकाल नहीं है। इसी प्रकार सौधर्म और ऐशान कल्पमें जानना चाहिए। तथा इसी प्रकार सनत्कुमार कल्पसे लेकर नौ ग्रैवेयक तकके देवोंमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमें स्त्रीवेद नहीं है । भवनवासो, व्यन्तर और ज्योतिषी देवोंमें सामान्य देवोंके समान भंग है । इतनी विशेषता है कि इनमें सम्यक्त्वका भंग कषायके समान है । $ २५६. अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तक के देवोंमें सम्यक्त्वके जघन्य अनुभागके उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल अनुदिश में वर्ष पृथक्त्व
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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