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________________ मार्गदर्शक विषयापासवपसागर जी महाराज अनादिकालसे जैन परम्परामें जो भी मङ्गल कार्य किया जाता है उसके मंगलाचरण पूर्वक करनेका प्रधात है। टीकाकार आचार्य ने अपने इष्ट मंगलकार्यको सिद्धिके अभिप्रायवश वेदक महाधिकारके आदिमें सर्व प्रथम सिद्धोंको भाव-द्रव्य नमस्कार किया है । जैसा कि इस अर्थाधिकारके नामसे स्पष्ट है इसमें यह मंमारी जीव मोहनीय कर्म और उसके अवान्तर भेदोंका कहां कितने काल तक सान्तर या निरन्तर किस रूपमें वेदन करता है आदि विषयका स्पष्ट निर्देश किया गया है। इसके मुख्य अधिकार दो हैं--उदय और उदोरणा . यहाँ कषायप्राभूतक पन्द्रह अधिकारोंमेरो इसे छटा अधिकार कहा गया है। इस ग्रन्धके प्रारम्भमें आचार्यचर्य वीरसेनने इन अधिकारोंका विचार तीन प्रकार किया है । उसके अनुसार एक दृष्टिसे यह सातवां अधिकार भी ठहरता है। हमने उन दृष्टिकी मुख्यतासे इसे सातवाँ अधिकार गुचित किया है। इसके लिए इस ग्रन्थकी प्रथम पुरतवा पर दृष्टिपात कीजिए। यों तो उदीरणा उदयविशेषका ही दूसरा नाम है। किन्तु उन दोनोंमें अन्तर यह है कि कोका जो वयाकाल फलविपाक होता है उनकी उदय संज्ञा है और जिन कार्मीका उदयकाल प्राप्त नहीं हुआ उनको उमाच विशेवरो पचाना उदीरा कहलाती है, इश महाधिकारको आचार्य नर्य गुणधरने चार सूत्र गाथाओं में निबद्ध किया है। उनमेंसे प्रथम मूष गाथा कदि श्रावलियं पवेसेइ इत्यादि है। इसका विरेचन यहाँ दो प्रकारसे किया गया है। इसको प्रथम व्यापामें बतलाया है कि इस द्वारा प्रकृति उदीरणा, प्रकृति उदय और उसकी कारणभूत बाह्य सामग्रीका निर्देपा किया गया है । यहाँ बतलाया है कि इसके प्रथम पाद द्वारा उदीरणा सूचित की गई है, टूसरे पाद द्वारा विस्तार सहित उदय सूचित किया गया है। उक्त गाथाके दूसरे पादद्वारा क्या सूचित किया गया है इसका प्रकारान्तरसे निर्देश करते हुए वहाँ बतलाया है कि अथवा उदयावलिके भीतर प्रविष्ट हुई. उदय प्रकृतियों और अनुदय प्रकृतियोंको ग्रहण कर प्रवेश संज्ञावाला अर्थाधिकार इस सुत्रवचन द्वारा सूचित किया गया है। यहां यह शंका होनेपर कि पहले जब कि वेदना महाधिकारमें उदय और उदीरणा ये दो अधिकार ही सूचित किये गये है ऐसी अवस्थामें उक्त पाद द्वारा तीसरे अधिकारका सूजन हुआ है यह कहना उपयुक्त नहीं है, समाधान करते हुए बतलाया है कि किसी भी प्रकारसे इस प्रदेश संज्ञावाले अधिकारका उदयके भीतर ही अन्तर्भाव हो जाता है, इसलिए कोई दोष नहीं है। इसप्रकार गायाके पूर्वार्धवा स्पष्टीकरण करने के बाद उसके उत्तरार्चका स्पष्टीकरण करते हुए बतलाया है कि क्षेत्र, भन्न, काल और पुद्गलोंको निमित्तकर कोंका उदब और उदीरणारूप फलबिपाक होता है । यहाँ क्षेत्र पसे नरकादि गतियोंका क्षेत्र लिया गया है, मनपदसे एकेन्द्रिय आदि पर्यायोंको ग्रहण किया गया है, काल पदसे शिषिर, वसन्त, नीम और बर्षाकाल आदिका ग्रहण हुआ है तथा पुद्गल पसे गन्ध, वाम्बूल, वस्त्र, आभरण आदि पुद्गलौका ग्रहण हुआ है । प्रकृति उदीरणाके समग्र विवेचन के बाद प्रवृति उदयका संकेत करते हुए उक्त गाथानो उत्तरार्धका आलम्बन लेकर चूणिसूत्र और उसकी टीकामें पुन: इसका विचार किया गया है। यहाँ उदयकी व्याख्या करनेके बाद लिखा है कि कोका वह उदव क्षेत्र, भव, काल और पुद्गलोको निमित्तकर होता है । टीकाके शब्द है-खेत्त-भव-काल-पोमाले मस्सिऊण जो द्विदिक्खयो उदिएणफलकम्मक्खंधपरिसडणलक्खणो सोदयो त्ति सुत्तस्थावलंबणादो।
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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