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________________ सावधासागर जामहाराज HTHHTHHALEE २७६ - जयधवलासहिदे कसायपाहुढे [वेदगो ५९९, इथिवे. जह० द्विदिउदी० चदुसंज० सिया उदी० | जदि० उदी०, णिय० अज० असंखे गुणभ० । एवं पुरिसके। ६००. हस्सइस जह० द्विदिमुदी० मिच्छत्तं णिय० उदी०, णिय. अजह. असंखे०गुणब्भ० । बारसक०-भय-दुगुला० सिया उदी० । जदि उदी०, णिय ० अजह संखेन्गुणभहियं । चदुसंजलण-तिएिणवे. सिया उदी। जदि उदी०, णिय० अजन , असंखेगुणभ० । रदि० णिय. उदी०, णिय० जहरणं । एवं रदीए । एवम.दि-सोग० | ६६०१. भय० जह० द्विदिउदी० मिच्छ०-णम० णिय० उदी। णिय० अजहएणा असंखे०गुणभ० । बारसमसया उदो दि उदी, जह० अजहण्णा था। जहण्णादो अजहण्णा समयुत्तरमादि कादण जाय पलिदो० असंखे भागभ० । चदुसंजल० मिण उदी० । जदि० उदी०, गिय० प्रजह० असंखे गुण भ० । हस्सरदि-अरदि-सोग० मिया उदी० । जदि उदी, णिय. अज. असंखे भागभः । दुगुला० सिया उदी० । जदि० उदी०, णिय० जहण्णा । एवं दुगुलाए । है। इसीप्रकार तीन संज्वलनकी जन्य स्थितिउदीरणाको मुख्य कर सन्निकर्ष जानना चाहिए । ५६६. स्त्रीवेदकी जघन्य स्थितिका उदीरक जीव चार संज्वलनोंका कदाचित् जीरक है। यदि उदीरफ है तो नियमसे असंख्यातगुणी अधिक अजघन्य स्थितिका उद्दीरक है। इसीप्रकार पुरुषवेदकी जघन्य स्थिसिउदीरणाको मुख्य कर सन्निकर्ष जानना चाहिए । ६००, हास्यकी जघन्य स्थितिका उदीरक जीव मिथ्यात्वका नियमसे उदीरक है जो नियमसे असंख्यातगुणी अधिक अजघन्य स्थितिका उदीरक है। बारह क.पाय, भय और जुगुप्साका कदाचित् उदीरक है। यदि उदीरक है तो नियमसे संख्यातगुणी अधिक अजघन्य स्थितिका जदीरक है। चार संज्वलन और तीन वेदका कदाचित् उदीरक है। यदि उदीरक है ता नियमसे असंख्यातगुणी अधिक 'अजघन्य स्थितिका उदीरक है। रतिका नियमसे उदीरक हैं जा नियमसे जघन्य स्थितिका उदोरक है। इसी प्रकार रसिकी जघन्य स्थिति उदारणाको मुख्य कर सन्निकर्ष जानना चाहिए। तथा इसीप्रकार अरति और शोककी जचन्य स्थितिउदारणाको मुख्य कर सन्निकर्ष जानना चाहिए। ६०१. भयकी जघन्य स्थितिका उदीरक जीव मिथ्यात्व और नपुंसकबेदका नियमसे उदीरक है जो नियमसे असंख्यात गुणी अधिक अजयन्य स्थितिका उदारक है । यारह कपायका कदाचित् दीरक है। यदि उदीरक है तो जघन्य या अजघन्य स्थितिका उदीरक है। यदि अजघन्य स्थितिका उनीरक है तो जघन्यकी अपेक्षा एक समय अधिकसे लेकर पल्यका असंख्यातवा भाग अधिक तककी अजयन्य स्थितिका जदीपक है। चार संज्वलनका कदाचित् उदारक है। यदि उहीरक है तो नियमसे असंख्यातगुणी अधिक अजघन्य स्थितिका उदीरक है। हास्य, रति, भरति और शोकका कदाचिन उदीरक है। यदि उदीरक है तो नियमसे असंख्यातवाँ भाग अधिक अजघन्य स्थितिका उदीरक है। जुगुप्साका कदाचित् उदीरक है । यदि उदीर क है तो नियमसे जघन्य स्थितिका उदोरक है । इसीप्रकार जुगुप्साकी जयन्य स्थिति 1. आप्रती संखे गुणभ० इनि पारः ।
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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