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________________ गा० ६२ ] उत्तरपडिउदीरणाए ठाणा से सागियो गद्दार परूवणा २०६ - ४६०. अंतरं दुविहं जह० उक्क० । उक्कस्से पयदं । दुविहो स्थि० - ओ० आदेसे० । श्रघेण मोह० उक० विदिउदी० अंतरं जह० एयसमत्रो, उक० अंगुलस्स असंखे० भागो । अणुक० रास्थि अंतरं । एवं चदुसु गदीसु । यरि मणुस अपज० मोहक दवा उसका पति सखे ० भागो । एवं जाव० । Q महाराज - ६ ४६१. जह० पदं । दुविहो णि० - ओषेण प्रादेसे० । श्रघेण मोह ० जह० हिदिउदी० अंतरं जह० एक्समओ, उक० छम्मासा । यज० णत्थि अंतरं । एवं मणुसतिए । णवरि मणुसिणी वासपुधन्तं । ४६२. आदेसेण रइय० मोह ० जह० द्विदिउदी० जह० एयस०, उक्क० अंगुलस्स असंखे० भागो । अज० पत्थि अंतरं । एवं सव्वरइय० - सच्चपंचिदियतिरिक्ख सव्वदेश ति । तिरिक्खेसु मोह० जह० अज० णत्थि अंतरं । मणुसअपज्ज० मोह० ६४६०. अन्तर दो प्रकारका है— जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है - श्रोध और आदेश । श्रघसे मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिके उदीरकों का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण है । अनुत्कृष्ट स्थितिके उदीरकोंका अन्तरकाल नहीं है । इसीप्रकार चारों गतियों में जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि मनुष्य अपर्याप्तकोंमें मोहनीयकी अनुत्कृष्ट स्थितिके उदीरकोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर प्रत्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है । इसीप्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । विशेषार्थ - मोहनी की उत्कृष्ट स्थितिकी उदीरणा कोई भी जीव न करे तो अंगुलके श्रसंख्यातवें भाग काल तक वह नहीं होती, इसके बाद उसके उदीरक एक या नाना जीव श्रवश्य होते हैं। यही कारण है कि यहाँ माना जीवोंकी अपेक्षा उसका उत्कृष्ट अन्तर काल अंगुलके असंख्यातवें भागप्रमाण बतलाया है। शेष कथन सुगम हैं । 1 $ ४६१. जघन्यका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-- श्रघ और आदेश | ओघले मोहनीयकी जघन्य स्थिति के उदीरकों का जघन्य श्रन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छड़ मह है । अजघन्य स्थितिके उदीरकका अन्तरकाल नहीं है। इसीप्रकार मनुष्यत्रिक में जानना चाहिए | किन्तु इतनी विशेषता है कि मनुष्यनियोंमें जघन्य स्थितिके उदीरकों का उत्कृष्ट अन्तर पृथक्त्व प्रमाण हैं | विशेषार्थ – मनुष्यनियों का उपशम और क्षपक श्रेणिपर श्रारोहणका उत्कृष्ट अर वर्षपृथक्त्व प्रमाण है इसलिए इनमें मोहनीयकी जघन्य स्थितिके उदरकोंका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। शेष कथन सुगम है । ६४६२. आदेश से नारकियों में मोहनीयकी जघन्य स्थितिके उदीरकोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अंगुलके असंख्यातवें भागप्रमाण है। अजघन्य स्थितिके aureater अन्तरकाल नहीं हैं। इसीप्रकार सब नारकी, सब पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च और सब देवोंमें जानना चाहिए । तिर्यों में मोहनीयकी जघन्य और अजघन्य स्थिति के उरकों का अन्तरकाल नहीं है । मनुष्य अपर्याप्तकों में मोहनीयकी जघन्य स्थितिके प्रदीरकोंका जघन्य २७
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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