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________________ गा० ६.] मुत्तगाहाणं विसयविभागपरूवणा बहुगदरं बहुगदरं से काले को णु थोवदरगं वा। अणुसमयमुदीरतो कदि वा समयं उदीरेदि ॥६॥ १०. एसा तदियगाहा ! एदीए पयडि-विदि-अणुभाग-पदेसविसयस्स भुजमाराणियोगो सप्पभेदो णिहिट्ठो। तं जहा-णिरुद्धसमयादो 'से काले' समणंतरसमए 'बहुगदरं० को उदीरेदि' ति एदेण पयडि-डिदि-अणुभाग-पदेसविसयस्स भुजगारपदस्स गिद्देसो को। 'को णु थोत्रदरगं वा' ति एदेण चि तब्बिसयअप्पदरपदं जाणाविदं । एत्थतण-'वा'-सद्देणाणुत्तसमुच्चयटेणावहिदावत्तव्यपदाणं गहणं कायव्वं । तदो एदेण गाहापुबद्रेण पयडि-डिदि-अणुभाग-पदेसुदीरणाविसयो भुजगाराणियोगो परूविदो त्ति सिद्धं । 'अणुसमयमुदीरेंतो' अणुसमयं समयं पडि भुजगारादिसरूवेणुदीरेमाणो 'कदि वा समए' केत्तिए वा समए पिरंतरसुदीरेदि ति एदेण भुजगार. विसयकालाणियोगदारं सूचिदं। एदेणेव देसामासयवयणेण सेसाणियोगद्दाराणं पि संगहो काययो । एदेणेव पदणिक्खेवो वड्डी च परूविदा; भुजगारविसेसो पदणिक्खेवो, पदाणिक्खेवविसेसो बडि ति णायादो । .........---~~~-- --~-...---.--...----- * विवक्षित समयसे तदक्षामाशयमय मेंबर श्रीबहसमता कम की उर्दीरणा करता है और कौन जीव अल्पतर अल्पतर कर्मों की उदीरणा करता है तथा प्रति समा उदीरणा करता हुआ यह जीव कितने समय तक निरन्तर उदीरणा करता है॥६१॥ १०. यह तीसरी गाथा है। इस द्वारा प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश विषयक अपने भेदोंके साथ भुजगारअनुयोगद्वार निर्दिष्ट किया गया है। यथा--विवक्षित समयसे 'से काले' अर्थात् तदनन्तर समयमें बहुतर बहुतर कर्मोकी कौन उदीरणा करता है सप्रकार इसस वचनद्वारा प्रकृति, स्थिनि, अनुभाग और प्रदेशविपयक भुजगारपदका निर्देश किया गया है । 'कोणु थोबदहां वा' इसप्रकार इस वचन द्वारा भी तद्विषयक अल्पतरपदका ज्ञान कराया गया है । यहाँ पर अनुक्तका समुचत्र करने के लिए पाये हुए 'वा' शब्दके द्वारा अवस्थित और अवक्तव्य पदोंका ग्रहण करना चाहिए । इसलिए गाथा के पूर्वार्धद्वारा प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशविषय क भुजगार अनुयोगद्वारको प्ररूपणा की गई है यह सिद्ध होता है। 'अणुसमयमुदीरतो अर्थात् प्रत्येक सम यों भुजगारादि रूपसे उदीरणा करता हुआ यह जीव 'कदि वा समए' अर्थात् कितने समय तक निरन्तर उदोरणा करता है. इसप्रकार इस वचनके द्वारा भुजगार विषयक कालानुयोगद्वार सूचित किया गया है। तथा इसी देशामर्षक वचनके द्वारा शेष अनुयोगद्वारोंका भी मंग्रह किया गया है। तथा इसी बनन द्वारा पदनिक्षेप और वृद्धि अनुयोगद्वार की प्ररूपणा की गई है, क्योंकि भुजगार विशेषका नाम पदनिक्षेप है और प्रदनिक्षेपविशेषका नाम वृद्धि है। ऐसा न्याय है।
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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