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________________ मा०६२] उत्तरपयडिजदीरणाए भुजगारपरूषणा - कालाणुगमेण दुविहो णि० -ओघेण आदेसे० । मोघेण भुज-अप्प०अबहिः केचिरं ? सम्बद्धा । अवत० जह, एगसमो, उक्क० संखेजा समया । एवं तिरिक्सावरि अमन विहासागर जी महाराज २१४. आदेसेख ऐरइय० भुज-अप्प० जह• एपस०, उक्क० श्रावलि असंखे भागों । अबढि सम्बद्धा । एवं सन्धणेरहय० सयपंचिंदियतिरिक्ख-देवा भवणादि जाव अवराजिदा ति । २१५ मणुसेसु णारयभंगो । णवरि अयत्त० ओघं । मांसपज०-मणुसिणी० भुज-अप्प अवच० जह० एयस० उक्क० संखेजा समया। अवढि मुबद्धा । एवं सबढे । णरि अवत्त० णस्थि । मणुसअपज भुज-अप्प० जह० एस०, उक्क० आवलि. असंखे भागो । अवट्टि जह० एगस०, उक्क ० पलिदो० असंखे० more ---------------nareneuruna... विशेषार्थ- अबक्तव्यपदकी उदीरणा उपशमश्रेणिसे उतरते समय ही होती है। और उपशमश्रेणि पर आरोहणका काल कमसे कम एक समय और लगातार संख्यात समय है, इसलिए अवक्तव्यपदका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय कहा है। २१४. प्रादेशसे नारकियोंमें भुजगार और अल्पतर पदके उदीरक जीवों का जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल श्रावलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। अवस्थितपदके दीरक जीवोंका काल सर्वदा है। इसीप्रकार सम्म नारकी, सब पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च, सामान्य देव और भवनवासियोंसे लेकर अपराजित विमान तकके देवों में जानना चाहिए। विशेषार्थ- पहले नारकियों में एक जीवकी अपेक्षा भुजगारपदके चुदीरकोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल चार समय तथा अल्पतरपदके उदीरकाका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल तीन समय बतला पाये हैं। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर यहाँ पर नाना जीवों की अपेक्षा भुजगार और अल्पतरपदके उदीरकोंका जयन्य काल एक समय और उत्कृष्ट फाल श्रावलिके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है, क्योंकि अनेक नारकी जीव भी उक्त दोनों पद एक समय तक करके दूसरे समयमें न करें यह भी सम्भव है, 'पीर नारकियोंकी संख्या असंख्यात होनेसे लगातार असंख्यात जीव भी क्रमसे यदि उक्त दोनों पद करें तो भी सब कालका योग श्रावलिके असंख्यातवें भागप्रमाण होता है। पहले एक जीवकी अपेक्षा अवस्थित पदके उदीरकोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त बसला आये हैं, इसलिए यहाँ पर नाना जीवोंकी अपेक्षा इस पदके उदीरकोका सब काल बन जानेसे वह उक्त प्रमाण कहा है। शेष कथन सुगम है। २१५. मनुष्योंमें नारकियों के समान भङ्ग है। किन्तु इतनी विशेषता है कि श्रवक्तव्य पदके उदीरकोंका भंग श्रोधके समान है। मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यनियों में मुजगार, भल्पतर और श्रवक्तव्यपदके उदीरकों का जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। अवस्थितपदके उदीरकोंका काल सर्वदा है। इसीप्रकार सर्वार्थसिद्धिमें जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि इनमें अवक्तव्यपद नहीं है। मनुष्य अपर्याप्तकों में भुजगार और अल्पतरपदके उदीरकोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल श्रावलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। अवस्थितपदके उदीरकोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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