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________________ ५४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ * एवमट्ठकसायाणं। ६ १६७. कुदो ? सामित्तभेदाभावादो। एत्युवलब्भमाणथोवयरविसेसपदुप्पायणट्ठमिदमाह * णवरि अजहएणाणुभागसंकामयंतर केवचिरं कालादो होदि ? ६१६८. सुगमं । * जहएणेण एयसमत्रो। ६ १६६. सव्वोवसामणाए अंतरिदस्स तदुवलंभादो। ® सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं जहएणाणुभागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि। ६१७०. सुगमं । * पत्थि अंतरं। ६ १७१. कुदो ? खवणाए जादजहण्णाणुभागसंकामयस्स पुणरुभवाभावादो। अजहएणाणुभागसंकोमयंतरं केवचिरकालादो होदि ? ६१७२. सुगमं । * जहणणेण एयसमभो । उकस्सेण उवहपोग्गलपरियडें । इसी प्रकार आठ कषायोंका अन्तरकाल जानना चाहिए। ६ १६७. क्योंकि मिथ्यात्वके स्वामीसे इनके स्वामीमें कोई भेद नहीं है । अब यहाँ पर प्राप्त होनेवाली थोडीसी विशेषताका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * कितु इतनी विशेषता है कि इनके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका कितना अन्तर है ? ६ १६८. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य अन्तर एक समय है । ६ १६६ क्योंकि सर्वोपशमनाके द्वारा अन्तरको प्राप्त हुए जीवके उक्त अन्तरकाल उपलब्ध होता है। * सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागके संक्रामकका कितना अन्तर है? ६ १७०. यह सूत्र सुगम है। * अन्तरकाल नहीं है। ६ १७१. क्योंकि क्षपणामें उत्पन्न हुए जघन्य अनुभागसंक्रमकी पुनः उत्पत्ति नहीं होती। * उनके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका कितना अन्तर है ? ६ १७२. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर उपार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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