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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ $ १५० तं जहा – अणुवस्ससंकामओ उकस्स काऊतोमुहुत्तकालं उकस्समेव संकामिय पुगो कंडयघादेणाणुकस्ससंकामओ जादो, लद्धमंतरं होइ । णवरि जहणणंतरे इच्छिजमाणे सव्वल हुमेन कंडयधादो करावेयव्त्रो । उक्कस्संतरे विवक्खिए सव्त्रचिरेणतोमुहुत्तेण कंडवादो करायो । ५० * एवं सोलसकसाय-णवणोकसायाणं । ९ १५१. जहा मिच्छत्तुकस्सारणुभागसंकामयाणं जहण्गुकस्तरपरूत्रणा क्या तहा एदेसि पि कम्माणं कायन्त्रा ति भणिदं होइ । संपहि अणुकस्साणुभागसंकामयगयविसेसपरूवणडुमुत्तरमुत्तं— * णवरि बारसकसाय-णवणोकसायाणमण कस्साणु भागसंकामयंतरं जहणण एयसमत्र । १५२. अप्पप्पणो सव्त्रोवसामणाए एयसमयमंतरिय विदियसमए कालं काऊण देवेपणपढमसम व संकामयत्तमुवगयम्मि तदुवलंभादो । * अणं'ताण॒ष॑धीणमणुकस्साणुभागसंकामयंतरं जहणेण अंतीमहन्तं । § १५०. यथा - मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट अनुभागका संक्रम करनेवाला जीव उसका उत्कृष्ट अनुभाग करके और अन्तर्मुहूर्त काल तक उत्कृष्ट अनुभागका ही संक्रम करके पुनः काण्डकघातके द्वारा अनुत्कृष्ट अनुभागका संक्रामक हो गया। इस प्रकार मिध्यात्वके अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रमका जन्य और उत्कृष्ट अन्तर प्राप्त हो जाता है । मात्र इतनी विशेषता है कि जघन्य अन्तरकी विवक्षा होने पर अति शीघ्र काण्डकघात कराना चाहिए। तथा उत्कृष्ट अन्तरकी विवक्षा होने पर बहुत बड़े अन्तर्मुहूर्त के द्वारा काण्डकघात कराना चाहिए । * इसी प्रकार सोलह कषाय और नौ नोकषायोंका अन्तरकाल जानना चाहिए । १५१. जिस प्रकार मिथ्यात्वके उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकोंके जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरका कथन किया है उसी प्रकार इन कर्मों का भी कथन करना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अब इन कर्मों के अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकसम्बन्धी विशेषताका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * किन्तु इतनी विशेषता है कि बारह कषायों और नौ नोकषायोंके अनुत्कृष्ट अनुभाग के संक्रामकका जघन्य अन्तर एक समय है । १५२. क्योंकि अपनी-अपनी सर्वोपशामनाके द्वारा एक समयका अन्तर करके और दूसरे समयमें मरकर देवोंमें उत्पन्न होने के प्रथम समयमें पुनः इनका संक्रम प्राप्त होने पर उक्त कर्मों के अनुत्कृष्ट अनुभाग के संक्रामकका जघन्य अन्तर एक समय उपलब्ध होता है । * अनन्तानुबन्धियोंके अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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