SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 73
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ४६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे * उक्कस्सेण उवड्डपोग्गलपरियहं । $ १३५. कुदो १ अद्धपोग्गल परियादिसमए पढमसम्मत्तं घेत्तरणुत्रसमसम्मत्तकाल - अंतरे चेय विसंजोय पुणो वि सव्वलहुं संजुत्तो होदूण आदि करिय अद्धपोग्गलपरियड' परिभमिय तदवसाणे अंतोमुहुत्तसेसे संसारे विसंजोयणापरिणदम्मि तदुवलंभादो । होदि ? [ बंधगो ६ * चदुसंजलण-पुरिसवेदाण' जहणाणुभागसंकामओ केवचिरं कालादो ९ १३६ सुगमं । * जहण्णु कस्सेण एयसमत्रो । $ १३७. कुदो १ तिन्हं संजलणाणं पुरिसवेदस्स च चरिमाणुभागबंधचरिमफालीए लोहसंजणस्स विसमयाहियावलियसकसायम्मि तदुवलद्धीदो । * अजहणणाणुभागसंकामत्रो अण 'ताणुबंधीण भंगो । १३८. जहा अणुबंधीणमजहण्णाणुभाग संकामयस्स तिणि भंगा परूविदा तहा एदेसि पि परूवणा कायन्त्रा, विसेसाभावादो । * इत्थि एवुंसयवेद-छएणोकसायाणं जहण्णाणु भागसंकाम केवचिरं कालादो होदि ? * उत्कृष्ट काल उपार्थपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है । १३५. क्योंकि अर्वपुद्गलपरिवर्तन कालके प्रथम समयमें प्रथम सम्यक्त्वको ग्रहण कर और उपशमसम्यक्त्वके कालके भीतर ही विसंयोजनाकर फिर भी अतिशीघ्र संयुक्त होकर जिसने अनन्तानुबन्धियोंके अजवन्य अनुभागसंक्रमका प्रारम्भ किया है । पुनः उसके साथ कुछ कम अर्धपुग्दलपरिवर्तन काल तक परिभ्रमणकर उक्त कालके अन्तमें संसार में अन्तर्मुहूर्त शेष रहनेपर जो पुनः त्रिसंयोजना से परिणत हुआ है उसके उतना काल उपलब्ध होता है । * चार संज्वलन और पुरुषवेद के जधन्य अनुभाग के संक्रामकका कितना काल है ? ६ १३६. यह सूत्र सुगम है । * जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । १३७. क्योंकि तीन संज्वलन और पुरुषवेदसम्बन्धी अन्तिम अनुभागबन्धकी अन्तिम फालिके समय तथा लोभसंज्वलनकी भी सकषाय अवस्थामें एक समय अधिक एक आवलि काल शेप रहनेपर उक्त काल उपलब्ध होता है । * उनके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका अनन्तानुबन्धियोंके समान भङ्ग है । ९ १३८. जिस प्रकार अनन्तानुबन्धियों के जघन्य अनुभागके संक्रामकके तीन भङ्ग कहे हैं उसी प्रकार इनकी भी प्ररूपणा करनी चाहिए, क्योंकि इसमें कोई विशेषता नहीं है । * स्त्रीवेद, नपुंसक वेद और छह नोकषायोंके जघन्य अनुभागके संक्रामकका कितना काल है ?
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy