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________________ ३६ गा०५८] उत्तरपयडिअणुभागसंकमे एयजीवेण कालो 8 एयजीवेण कालो। ६१०३ सुगममेदमहियारसंभालणसुत्तं । ® मिच्छत्तस्स उक्कस्साणुभागसंकामो केवचिरं कालादो होदि ? ६१०४. सुगमेदं पुच्छासुत्तं । * जहणणुकस्सेण अंतोमूहुत्तं । ६१०५. जहण्णेण ताव उक्कस्साणुभागं बंधिदूणावलियादीदसंकामेमाणएण सबलहुमणुभागखंडए घादिदे अंतोमुहुत्तमेत्तो उकस्साणुभागसंकामयजहाणकालो लद्धो होइ । एत्तो संखेजगुणो उकस्सकालो होइ, उकस्साणभागं बंधिऊण खंडयघादेण विणा सुट्ठ बहुअं कालमच्छंतस्स१ वि अंतोमुहुत्तादो उपरिमवट्ठाणासंभवादो। ® अणुक्कस्साणुभागसंकामो केवचिरं कालादो होदि ? ६१०६. सुगमं । स्वामित्व नहीं बन सकता, क्योंकि न तो दर्शनमोहनीयकी क्षपणाके अन्तिम समयमें सम्यक्त्वके अनुभागका संक्रम सम्भव है और न ही संयुक्त होनेके प्रथम समयमें अनन्तानुबन्धीचतुष्कके अनुभागका संक्रम सम्भव है, इसलिए यहाँ पर नारकियोंमें इन प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागसंक्रमके स्वामित्वको ओघके समान जाननेकी अलगसे सूचना की है। खुलासा जघन्य संक्रम प्रकरणके ओघको देख कर लेना चाहिए। इसी प्रकार अन्यत्र जहाँ जो विशेषता कही गई है उसका विचार कर लेना चाहिए। यहाँ पर योनिनी तिर्यञ्चों तथा भवनवासी और व्यन्तर देवोंमें सम्यक्त्वके जघन्य अनुभागसंक्रमका निषेध किया है सो उसका वह तात्पर्य है कि इन मार्गणाओंमें कृतकृत्यवेदकसम्यग्दृष्टि जीव नहीं उत्पन्न होता, इसलिए वहाँ सम्यक्त्वका और सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य अनुभागसंक्रम नहीं बनता। यह विशेषता द्वितीयादि पृथिवियोंमें और ज्योतिषी देवोंमें भी जाननी चाहिए । शेष कथन स्पष्ट ही है। * एक जीवकी अपेक्षा काल । ६ १०३. अधिकारकी सम्हाल करनेवाला यह सूत्र सुगम है। * मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागकसंक्रामकका कितना काल है ? ६ १०४. यह पृच्छासूत्र सुगम है। * जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तमुहूत है। ६१०५. उत्कृष्ट अनुभागका बन्ध करके एक आवलिके बाद संक्रम करता हुआ यदि अतिशीघ्र अनुभागकाण्डकका घात करता है तो भी उत्कृष्ट अनुभागके संक्रमका जघन्य काल अन्तर्मत प्राप्र होता है। तथा उससे संख्यातगणा उत्कृष्ट काल होता है, क्योंकि उत्कृष्ट अनुभागका बन्ध करके काण्डकघातके बिना यदि बहुत काल तक रहता है तो भी अन्तर्मुहूर्तसे अधिक काल तक रहना सम्भव नहीं है। * इसके अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका कितना काल है ? ६१०६. यह सूत्र सुगम है १ श्रा०प्रतौ -मच्चंतस्स ता प्रतौ मच्चं (च्छ ) तस्स इति पाठः।।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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