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________________ गा०५८] उत्तरपयडिअणुभागसंकमे सामित्त सामित्तं । ६ ७४. सामित्तमिदाणि कस्सामो ति पइण्णावक्मेदं । सब-णोसव्यसंकमादीणं सुत्ते किमढ णिद्देसो ण कदो ? ण, तेसिं सुगमाणं वक्खाणादो चेव पडिवत्ती होइ ति तदकरणादो। तं च सामित्तं दुविहं जहण्णकस्साणुभागसंकमविसयत्तेण । तत्थुक्कस्साणुभागसंकमविसयं ताव सामित्तं परूवेमाणो सुत्तमुत्तरं भणइ ® मिच्छत्तस्स उकस्साणुभागसंकमो कस्स ? ६७५ सुगमं । * उकस्साणुभागं बंधिदूणावलियपडिभग्गस्स अण्णदरस्स । ६७६. मिच्छत्तस्स उक्कस्साणुभागमुक्कस्ससंकिलेसेण बंधियण जो आवलियपडिभग्गो तस्स पयदुक्स्ससामित्तं होइ । आवलियपडिभग्गं मोत्तण बंधपढमसमए चेत्र सामित्तं किण्ण दिजदे ? ण, अणइच्छाविय बंधावलियस्स कम्मस्स ओकड्डणादिसंकमणाणं पाओग्गत्ताभावादो ।सो वुण मिच्छत्तुकस्साणुभागबंधगो सण्गिपंचिंदियपजत्तमिच्छाइट्ठी सव्वसंकिलिट्ठो। अपेक्षा अध्रुव और अभव्यों की अपेक्षा वह ध्रुव होता है, इसलिए इन चारों प्रकृतियोंके अजघन्य अनुभागसंक्रमको भी सादि आदिके भेदसे चार प्रकारका कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है। * स्वामित्वका प्रकरण है। ६ ७४. इस समय स्वामित्वका कथन करते हैं इस प्रकार यह प्रतिज्ञावचन है । शंका-सर्वसंक्रम और नोसर्वसंक्रम आदिका सूत्रमें निर्देश किसलिए नहीं किया ? ... समाधान नहीं, क्योंकि वे सुगम हैं । व्याख्यानसे ही उनका ज्ञान हो जाता है, इसलिए उनका सूत्रमें निर्देश नहीं किया । जघन्य अनुभागसंक्रम और उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमको विषय करनेवाला होनेसे वह स्वामित्व दो प्रकारका है। उनमेंसे उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमविषयक स्वामित्वका सर्व प्रथम कथन करते हुए आगेका सूत्र कहते हैं * मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका स्वामी कौन है ? ६५. यह सूत्र सुगम है। * मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागका बन्धकर प्रतिभग्न हुए जिसे एक आवलि काल हुआ है ऐसा अन्यतर जीव मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका स्वामी है। ६७६. मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागको उत्कृष्ट संक्लेशसे बाँधकर जिसे प्रतिभग्न हुए एक श्रावलि हो गया है उसके प्रकृत उत्कृष्ट स्वामित्व होता है। ... शंका–प्रतिभग्न हुए एक आवलि कालको छोड़कर बन्ध होनेके प्रथम समयमें ही उत्कृष्ट स्वामित्व क्यों नहीं दिया जाता है ? समाधान नहीं, क्योंकि बन्धावलिको बिताये बिना कर्ममें अपकर्षण श्रादि रूप संक्रमणों की योग्यता नहीं पाई जाती। परन्तु मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागका बन्ध करनेवाला वह जीव संज्ञी पञ्चेद्रिय पर्याप्त मिथ्या
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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