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________________ गा०५८] उत्तरपडिपदेससंकमे संकमट्ठाणाणि ४७७ संकमट्ठाणाणि समुप्पण्णोणि हवंति । होताणि वि खविदजहण्णदव्वे गुणिदुक्कस्सदव्वादो सोहिदे सुद्धसेसे ख्वाहियम्मि जत्तिया परमाण अस्थि तत्तियमेत्ता चे संकमट्ठाणवियप्पा सब्बसंकममस्सिऊण समुप्पण्णा हवंति । ६७८१. एवमेतिएण पबंघेण मिच्छत्तस्स संकमाणपरूषणं काढूण संपहि एदेणेव गयत्थाणं सेसकम्माणं पि पयदत्यसमप्पणं कुणमाणो सुत्तमुत्तरं भणइ एवं सव्वकम्माणं । ६७८२. जहा मिच्छत्तस्स संकमट्ठाणपरूवणं कयं तहा सेसकम्माणं पि कायव्यं । कुदो ? सबसंकमे अणंताणि संकमट्ठाणाणि तदो अण्गत्थासंखेजलोगा संकमट्ठाणाणि होति, एदेण भेदाभोवादो । संपहि एदेण सामण्णणिद्दे सेण लोहसंजलणस्स वि सब्यसंकमविसयाणमर्णताणं संकमट्ठाणाणमत्थित्ताइप्पसंगे तप्पडिसेहदुवारेणासंखेज्जलोगमेत्ताणं चेव संकमट्ठाणाणं तत्थ संभवं पदुप्पायणट्ठमुत्तरसुत्तमाह वरि लोहसंजलणस्स सव्वसंकमो पत्थि । ६७८३. किं कारणं १ परपयडिसंछोहणेण विणा खविदत्तादो । तम्हा लोहसंजलणस्सासंखेजलोगमेत्ताणि चेव संकमट्ठाणाणि अधापवत्तसंकममसिऊण परूवेयवाणि त्ति संक्रमस्थान उत्पन्न होते हैं । होते हुए भी क्षपित कर्माशिकके जघन्य द्रव्यको गुणित कर्मा शिकके उत्कृष्ट द्रव्यमेंसे कम करने पर एक अधिक शुद्ध शेष में जितने परमाणु हैं उतने ही संक्रमस्थानके विस्प सर्वसंक्रमके आश्रयसे उत्पन्न होते हैं। ६७१. इस प्रकार इतने प्रबन्धके द्वारा मिथ्यात्वके संक्रमस्थानोंकी प्ररूपणां करके अब इसी पद्धतिसे ही गतार्थ शेष कर्मों के भी प्रकृत अर्थका समर्पण करते हुए आगेका सूत्र कहते हैं___ * इसी प्रकार सब कर्मों के संक्रमस्थान जानने चाहिए। ६७८२. जिस प्रकार मिथ्यात्वके संक्रमस्थानोंकी प्ररूपणा की है उसी प्रकार शेष कर्मों के संक्रमस्थानोंकी प्ररूपणा भी करनी चाहिए, क्योंकि सर्वसंक्रममें अनन्त संक्रमस्थान होते हैं और उससे अन्यत्र असंख्यात लोकप्रमाण संक्रमस्थान होते हैं इस अपेक्षासे कोई भेद नहीं है । अब इस सामान्य निर्देशसे लोभसंज्वलनके भी सर्वसंक्रमविषयक अनन्त संक्रमस्थानों के प्राप्त होने पर उनके प्रतिषेध द्वारा असंख्यात लोकमात्र ही संक्रमस्थान वहाँ सम्भव हैं ऐसा कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * इतनी विशेषता है कि लोभसंज्वलनका सर्वसंक्रम नहीं होता । ६७८३. क्योंकि पर प्रकृतिमें संक्रमण हुए बिना उसका क्षय होता है। इसलिए अधःप्रवृत्तसंक्रमके आश्रयसे लोभसंज्वलनके असंख्यात लोकमात्र ही संक्रमस्थान कहने चाहिए यह उक्त कथनका मावार्थ हैं। अब इन दोनों ही सूत्रों द्वारा प्रगट किये गये अर्थका स्पष्टीकरण करनेके
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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