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________________ २२ promp> जयश्चवलासहिदे कसायपाहुडे [बन्धगो । पडिसिद्धताहो तपासासामसकसो वडागिलो वेब, तत्थ पयारतराणुवलंभारे। आणुकसामसंकमो मा बडाणिओ, विद्वाणिओ विहाणिो या, तिण्हमेदेसि भावणं तत्थ संभवादो जमाणभागसंस्मो विद्वामिओ चेक, तत्य पयारतासंभवादो। अजहण्णाणुभागसंकमो विट्ठाणिओ तिहाणिओ चउट्ठाणिओ वा, तिविहस्स वि भावस्स तत्थ संभवादो। एदेण सामण्णायगेण सम्मामिछत्तस्स वि सबघादितणावहारियस्स तिहाणिय-चउहाणियाणुभागसंकमाइप्पसंगे तारिणतारणहसतमाह FE TRवरि सम्मामिछत्तम वेवाणिओ चेव । - 3 ६६६ सम्मानित उक्लम्साकस्स-जहण्णाजण्णायुभागसंकमी वेढाणियत्वेगावहारेयौं, दारुअसमाणापतिमभामे चेक सत्पादित्तेण तद॑णुभागस्स पञ्जवसिदचादो । एवमेदेसि सणाविसेसपरिक्खं काऊण संपहि परिसवेद-चदुसंजलणाणुभागसंकमस्स संण्णाविसेस पदप्पायणमवारमसुत्तमाह ......*अक्खवग-अणवसामगस्स.चदुसज़लए-पुररसवदागास मिच्छत्तभंगी। ६७. कुंदो ? सवैधादितगण वि-त-बवाणियत्तणेण च भेदाभावादो। संपहि सु तब्भेदसंभवपदप्पायणमिदमाह - है। एकस्थानिक नहीं होता क्योकिसकस्थानिक अनुभागसंक्रमका सर्वघाति होनेका निषेध है। उसमें भी उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम चतुःस्थानिक ही होता है, क्योंकि उसमें अन्य प्रकार नहीं उपलब्ध होता । परन्तु अनुत्कृष्ट अनुमांगसंक्रम चतुःस्थानिक) त्रिस्थानिक या द्विस्थानिक होता है. क्योंकि इसमें ये तीनों प्रकार सम्भव हैं जिन्य अनुभागसंक्रमविस्थानिकाही होता है क्योंकि इसमें अन्य प्रकार सम्भव नहीं है। तया अजय अनुमानिसक्रम विस्थाभिक त्रिस्थानिक या चतुस्थिानिक होता है, क्योंकि इसमें उक्त तीनों प्रकारका अनुभगसक्रम सम्भव है। इस प्रकार इल सामान्य वचनके अनुसार सर्वघातिरूपसेनिश्चता किये गये। सम्यस्मिथ्यात्वमें भी त्रिस्थानिक और चतु:स्थानिक अनुभागसंक्रमका अतिप्रसङ्ग होने पर उसका निवारण करनेके लिए आगेका सूत्र कहते है ITTEFERREE । TEE MPETES #इतनी विशेषता है कि सम्पमिथ्यात्वका अनुभागसंक्रम बिस्थानिक ही होता है। ६६. सम्यग्मिप्यास्त्रके उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ठ, जघन्य और अजघन्य अनुभागसक्रमको द्विस्थामिक ही निश्चय करना चाहिए, क्योंकि दोरुसमान अनुभागसंक्रमके अनन्सवें भागम ही सर्वकातिरूपसे उसके स्त्रानुभागेका पर्यवसानां देखा जाता है। इस प्रकार इनकों की संज्ञा विशेषकी परीक्षा करके अब पुरुषवेद और चार संज्वलनोंके अनुभागसंक्रमकी संज्ञाविशेषका कथन करने के लिए -मोका सूत्र कहते हैं। RaptiSF E T अक्षपक और अनुपशामक जीतके वार संज्वलना और पुरुषवेदके अनुमासंक्रमका भङ्ग मिथ्या समान है #Free , ६७. क्योंकि सर्वघातिरूपसे तथा द्विस्थानिक, निस्थानिक और चतु:स्थानिकरूपसे मिथ्यात्वकी अपेच्छा उक्त कमों के अनुभागसंक्रममें भेद नहीं है। अब आपक और उपसमकोंमें जसका भेद सम्भव है इस बातका कथन करनेके लिए, यह सूत्र कहते हैं- एक) । S
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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