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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो६ ६२४. एवं तिचरिम-चदुचरिमादिकमेणाणताणि फद्दयाणिजहण्णाइच्छावणा-णिक्खेवमेत्ताणि हेढदो ओसरिदूण तदित्यफदयमुक्कड्डिअदि, तत्थाइच्छावणा-णिक्खेवाणं पडिवुण्णत्तदंसणादो । एत्तो हेट्ठिमफइयाणं जहण्णफद्दयपजंताणमुकड्डणाए णत्थि पडिसेहो। एत्थ जहण्णाइच्छावणा-णिक्खेवादिपदाणं पमाणविसयणिण्णयजणणडमप्पाबहुअसुत्तमाह- . 8 सव्वत्थोवो जहएणो णिक्खेवो। ६ २५. किंपमाणो एस जहण्णणिक्खेवो ? एयपदेसगुणहाणिट्ठाणतरफदएहितो अर्णतगुणमेत्तो। * जहणिया अइच्छावणा अपंतगुणा । ६२६. ओकडणा-जहण्णाइच्छावणाए समाणपरिमाणत्तादो। * उकस्सो णिक्खेवो अणंतगुणो। ६. २७. मिच्छाइट्ठिणा उकम्साणुभागे बज्झमाणे जहण्णफद्दयादिवग्णणुक्कडणाए रूपाहियजहणाइच्छावणापरिहीणुकस्साणुभागवंधमेत्तुकस्सणिक्खेवदसणादो। एसो च ओकड्ड क्कड्डणासु समाणपरिमाणो । * उकस्सो बंधो विसेसाहिओ। ६२८. केत्तियमेतेण ? रूवाहियजहण्णाइच्छावणामेत्तैग। ६ २४. इस प्रकार त्रिचरम और चतुश्चरम आदिके क्रमसे जघन्य अतिस्थापना और जघन्य निक्षेपप्रमाण अनन्त स्पर्धक नीचे सरककर वहाँ पर स्थित स्पर्धकका उत्कर्षण हो सकता है, क्योंकि वहाँ पर प्रतिस्थापना और निक्षेप ये दोनों पूरे देखे जाते हैं। इससे लेकर जघन्य स्पर्धक पर्यन्त नीचेके सब स्पर्धकोंका उत्कर्षण होने में प्रतिषेध नहीं है। अब यहाँ पर जघन्य अतिस्थापना और जघन्य निक्षेप आदि पदोंके प्रमाणविषयक निर्णयको उत्पन्न करनेके लिए अल्पबहुत्व सूत्र कहते हैं * जघन्य निक्षेप सबसे स्तोक है। ६२५. शंका--इस जघन्य निक्षेपका क्या प्रमाण है ? समाधान-एकप्रदेशगुणहानिस्थानान्तरसे उसका प्रमाण अनन्तगुणा है । * उससे जघन्य अतिस्थापना अनन्तगुणी है। ६२६. क्योंकि यह अपकर्षण विषयक जघन्य अतिस्थापनाके बराबर है। * उससे उत्कृष्ट निक्षेप अनन्तगुणा है। ६२७. क्योंकि यह मिथ्यादृष्टिके द्वारा उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करनेके बाद जघन्य स्पर्धककी प्रथम वर्गणाका उत्कषर्ण करने पर रूपाधिक जघन्य प्रतिस्थापनासे हीन उत्कृष्ट अनुभागबन्धप्रमाण उत्कृष्ट निक्षेप देखा जाता है । अपकर्षण और उत्कर्षण दोनों स्थलों पर इस निक्षेपका परिमाण बराबर है। * उससे उत्कृष्ट बन्ध विशेष अधिक है। २८. कितना अधिक है ? रूपाधिक जघन्य प्रतिस्थापनाका जितना प्रमाण है उतना ...... अधिक है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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