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________________ गा०५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे भुजगारो ३२५ एय३० । उक० तिण्णि पलिदोवमाणि पुनकोडितिभागेण सादिरेयाणि । ६४१४. देवेसु मिन्छ०-सम्मामि०-अणंताणु०चउक्क.इत्थिवे०-णqस० णारयभंगो। णवरि अप्प० संका. जह० एयसः। उक. तेत्तीसं सागरोवमाणि । सम्मबारसक०-पुरिसवे०-छण्णोक० णारयमंगो । एवं भवणादि जाव णव गेवजा त्ति । णवरि सट्ठदी जाणियव्वा । ६४१५. अणुदिसादि सव्वट्ठा ति मिच्छ०-सम्मामि०-इस्थिवे०-गवंस० अप्प० संका० जहण्णुक्क० जहण्णुक्कस्सट्ठिदी । अणंताणु०चउक्क० भुज० जहण्णुक० अंतोमु० । अप्प० संका० जह० अंतोमु० । उक्क० सगहिदी । बारसक०-पुरिसवे०-छष्णोक० देवोघं । इतनी और विशेषता है कि सामान्य मनुष्य और मनुष्यपर्याप्तकोंमें स्त्रीवेद और नपुंस वेदके अल्पतरसंक्रामकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पूर्वकोटिका त्रिभाग अधिक तीन पल्य है विशेषार्थ—सामान्य मनुष्य और मनुष्यपर्याप्त अधिकसे अधिक पूर्वकोटिका त्रिभाग अधिक तीन पल्यतक ही सम्यग्दृष्टि रहते हैं, इसलिए इनमें स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके अल्पतरसंक्रमका उत्कृष्ट काल उक्त प्रमाण कहा है । शेष कथन सुगम है। ६४१४. देवोंमें मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, स्त्रीवेद और नपुंसक वेदका भङ्ग नारकियोंके समान है । इतनी विशेषता है कि इनमें उक्त कर्मो के अल्पतरसंक्रामकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल तेंतीस सागर है । सम्यक्त्व, बारह कषाय, पुरुषवेद और छह नोकषायोंका भङ्ग नारकियोंके समान है । इसी प्रकार भवनवासियोंसे लेकर नौ ग्रैवेयक तक जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि अपनी अपनी स्थिति जाननी चाहिए। विशेषार्थ-देवोंमें सम्यक्त्वका उत्कृष्ट काल तेंतीस सागर है, इसलिए इनमें मिथ्यात्व आदि आठ कर्मों के अल्पतरसंक्रामकोंका उत्कृष्टकाल तेतीस सागर बन जानेसे वह उक्त कालप्रमाण कहा है । सौधर्म कल्पसे लेकर नौ प्रैवेयकतकके देवोंमें भी यह काल अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। भवनत्रिकों में यद्यपि सम्यग्दृष्टि जीव मरकर नहीं उत्पन्न होते फिर भी जो जीव वहाँ उत्पन्न होनेके पूर्व अन्तमुहूर्त तक अल्पतर बन्ध कर रहे हैं उनके वहाँ उत्पन्न होने पर और अतिशीघ्र सम्यक्त्वको स्वीकार कर लेने पर उनके भी इन कर्मों के अल्पतर संक्रामकोंका अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण यह काल बन जाता है, इसलिए इनमें भी यह काल अपनी स्थितिप्रमाण कहा है। शेष कथन सुगम है। ६४१५. श्वनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवों में मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके अल्पतर संक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल अपनी अपनी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति प्रमाण है । अनन्तानुबन्धी चतुकके भुजगारसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त है । अल्पतरसंक्रामकका जघन्य काल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट काल अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है । बारह कषाय, पुरुषवेद और छह नोकषायोंका भङ्ग सामान्य देवोंके समान है। विशेषार्थ-उक्त देवोंमें सब जीव सम्यग्दृष्टि ही होते हैं, इसलिए इनमें मिथ्यात्व आदि चारके अल्पतरसंक्रामकोंका जघन्य काल अपनी अपनी जघन्य स्थितिप्रमाण और उत्कृष्ट काल १. माणियन्वा ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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