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________________ गा०५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे भुजगारो ६३६६. एत्थेयसमयपरूवणा ताव कीरदे। तं जहा–उव्वेल्लमाणमिच्छादिट्ठिणा मिच्छत्तपढमट्ठिदिचरिमसमए चरिमुव्येल्लणखंडयं पढमफालीए गुणसंक्रमेण संकामिदाए एयसमयं भुजगारसंकमो होदण सम्मत्तप्पत्तिपढमसमए अप्पयरसंकमो जादो लदो एयसमयमेतो सम्मामिच्छत्तभुजगारसंकमजहण्णकालो। 'दो वा समया' पुव्वं व उव्वेल्लेमाणएण दोसु समएसु चरिमुव्वेल्लगखंडयं संकामिय सम्मत्ते समुप्पाइदे तदुवलंभादो । एवं तिसमय-चदुसमयादिभुजगारसंकमकालवियप्पा समुप्पाएयव्वा जाव उकस्सेण अंतोमुहुत्तमेतचरिमुवेल्लगखंडयुकीरणद्धापमाणो सम्मामिच्छत्तभुजगारसंकामयकालो संजादो त्ति । संपहि सम्मामिच्छत्तस्स पयारंतरेणावि अंतोमुहुत्तमेतभुजगारुकस्सकालसंभवपदुप्पायणटुं सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ । अधवा सम्मत्तमुप्पादेमाणयस्स वा तदो खवेमाणयस्स वा जो गुणसंकमकालो सो वि भुजगारसंकामयस्स कायव्वो। ६३६७. कुदो ? गुणसंकमविसए भुजगारसंकमं मोत्तूण पयारंतरासंभवादो। 8 अप्पदरसंकामगो केवचिरं कालादो होदि ? ६३६८. सुगमं । ॐ जहपणेण अंतोमुहुत्तं । ६३६६. यहाँ पर सर्व प्रथम एक समयकी प्ररूपणा करते हैं। यथा-उद्वेलना करने वाले मिथ्याष्टिके द्वारा मिथ्यात्वकी प्रथम स्थितिके अन्तिम समयमें अन्तिम उद्वेलना काण्डककी प्रथम फालिके गुणसंक्रमके द्वारा संक्रमित करने पर एक समय तक भुजगार संक्रम होकर सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके प्रथम समयमें अल्पतर संक्रम हो गया। इस प्रकार सम्यग्मिथ्यात्वके भुजगार संक्रमका जघन्य काल एक समय प्राप्त हुआ। अथवा दो समय काल है, क्योंकि पहलेके समान उद्वेलना करनेवाले जीवके द्वारा दो समय तक अन्तिम उद्वेलना काण्डकको संक्रमा कर सम्यक्त्वको उत्पन्न करने पर उक्त दो समय काल उपलब्ध होता है। इस प्रकार दो समय और तीन समय आदि भुजगार संक्रम कालके विकल्प उत्कृष्टसे अन्तमुहूर्त मात्र अन्तिम उद्वेलना काण्डकके उत्कीर्ण काल प्रमाण सम्यग्मिथ्यात्व सम्बन्धी भुजगार संक्रामक कालके उत्पन्न होने तक उत्पन्न करने चाहिए। अब सम्यग्मिथ्यात्वके भुजगार संक्रमका उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त प्रमाण प्रकारान्तरसे भी सम्भव है इस बातका कथन करनेके लिए भागेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * अथवा सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेवालेका तथा क्षपणा करनेवालेका जो गुण संक्रमका काल है वह भी भुजगार संक्रामकका करना चाहिए। ६ ३६७. क्योंकि गुणसंक्रममें भुजगार संक्रमको छोड़कर अन्य कोई प्रकार सम्भव नहीं है। * अल्पतर संक्रामकका कितना काल है ? ६३६८. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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